अलोकतांत्रिक हंसी- वरिष्ट पत्रकार सौरव तिवारी की फेसबुक वॉल से

सृष्टि में केवल इंसान ही ऐसा प्राणी है जिसे हंसने का नैसर्गिक गुण हासिल है। लेकिन यहीं हंसी बेवजह, बेवक्त, बेशर्म तरीके से व्यक्त होकर ‘रेणुकाई विवाद’ का कारण भी बन जाती है। दरअसल हंसी का अपना पूरा शास्त्र, दर्शन, विज्ञान और लोककायदा-कानून है। आइए रेणुका चौधरी की हंसी से उपजे विवाद के परिप्रेक्ष्य में इसे समझने की कोशिश करते हैं।

हंसी की कैटेगरी का निर्धारण ओंठों के खुलने-सिकुड़ने के आकार-प्रकार से होता है। ओंठ हल्के खुलें तो मुस्कान, मध्यम खुले तो खिलखिलाहट और पूरा खुल जाएं तो अट्टहास। हंसी के निर्धारण में ओंठ के साथ दांतों की भी सहायक भूमिका होती है। मुस्कान की सब कैटगरी तो दांतों के दिखने से तय होती है। मसलन अगर कोई बिना दांत दिखाए मुस्करा रहा है तो मंद-मंद मुस्कराना कहलाता है। मंद-मंद मुस्कराने के पीछे कई राज छिपे होने की वजह से ये हंसी की बेहद रहस्यमयी श्रेणी कहलाती है। इस रहस्यमयी मुस्कान में कभी कुटिलता का भाव छिपा होता है तो कभी सब कुछ भांप लेने का संकेत। वहीं अगर मुस्कान के साथ दांत भी दिख जाएं तो मुस्कान कंपरेटिव डिग्री में तब्दील होकर खिलखिलाहट बन जाती है। इसे कुछ हंसीशास्त्री उन्मुक्त हंसी के तौर पर भी परिभाषित करते हैं। हालांकि दांत दिखाते वक्त सावधानी बरतना भी जरूरी है, वरना इंसान के दंतनिपोर की श्रेणी में प्रवेश करते देर नहीं लगती। वहीं हंसी की सुपरलेटिव डिग्री अट्टहास कहलाती है। वैसे अट्टहास और ठहाके दोनों भाई हैं। बस ये समझ लीजिए कि ठहाका छोटा तो अट्टहास बड़ा भाई है। ठहाका सात्विक है तो अट्टहास तामसी। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि सभ्रांत जन ठहाके लगाते हैं जबकि दुर्जन अट्टहास करते हैं। अब इस आधार पर संसद में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के दौरान गूंजी रेणुका चौधरी की हंसी को आप गुणीजन ठहाकों की श्रेणी में रखेंगे या अट्टहास की, इसका फैसला आप स्वयं करें।

 

हंसी के कई फायदे-नुकसान भी हैं। फायदों की बात करें तो हंसी का सेहत से सीधा नाता है। तभी तो सेहतमंद रहने के लिए डॉक्टर दिल खोलकर हंसने की सलाह देते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि हंसना सदैव फायदेमंद ही साबित हो। मंशा कुटिल हो तो हंसी विवाद और मनमुटाव की वजह बन जाती है। द्वापर युग में द्रोपदी का दुर्योधन के पानी में गिरने पर हंसना तो महाभारत युद्ध का कारण बन गया था। और अब संसद में रेणुका तौधरी के हंसने पर जुबानी महाभारत छिड़ गई है।

 

हंसी में कई संकेत छिपे होते हैं, जिसके जरिए हंसी मनोविज्ञान के ज्ञाता हंसीधारक की मंशा को परख लेते हैं। तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छिपा रहे हो। हंसी प्रणय निवेदन की स्वीकार्यता की मंजूरी की भी परिचायक है जो प्रेमियों को हां या ना की दुविधा से ऊबारती है। लवगुरू इसी हंसी को आधार बनाकर अपने चेलों को ‘लड़की हंसी, यानी फंसी’ के फार्मूले की कसौटी पर प्रेमिका की मंशा को भांपने का गुरुमंत्र देते मिल जाते हैं। लेकिन जब मामला प्यार की बजाय खुन्नस का रहता है तो हंसने और फंसने का अंतरसंबंध ‘संसद हंसीकांड’ के तौर पर परिभाषित होता है। संसद के हंसीकांड ने हंसी की एक और कैटेगरी का ईजाद कर दिया है और वो है ‘अलोकतांत्रिक हंसी’।

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