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भाजपा के खाते से ऐसे गई तखतपुर सीट, पहली बार हुई महिला विधायक निर्वाचित

फोर्थ आई न्यूज़ की स्पेशल विधानसभा सीटों के विश्लेषण की सीरीज में आज हम दर्शकों की मांग पर तखतपुर विधानसभा सीट का विश्लेषण करने जा रहे हैं। यह हमारे प्रदेश की ऐसी सीट थी जो बीजेपी का गढ़ मानी जाती थी मगर कांग्रेस ने इस गढ़ में ना सिर्फ सेंधमारी करते हुए अपना कब्ज़ा जमाया मगर इतिहास भी बदला। वो कैसे चलिए हम आपको बताते हैं।

VO : फोर्थ आई न्यूज़ की स्पेशल विधानसभा सीटों के विश्लेषण की सीरीज में आज हम दर्शकों की मांग पर तखतपुर विधानसभा सीट का विश्लेषण करने जा रहे हैं। यह हमारे प्रदेश की ऐसी सीट थी जो बीजेपी का गढ़ मानी जाती थी मगर कांग्रेस ने इस गढ़ में ना सिर्फ सेंधमारी करते हुए अपना कब्ज़ा जमाया मगर इतिहास भी बदला। वो कैसे चलिए हम आपको बताते हैं।

हमारे छत्तीसगढ़ ज़िले की न्यायधानी है बिलासपुर। बिलासपुर ज़िले के अंतर्गत ही तखतपुर विधानसभा सीट आती है। बिलासपुर से 30 किलोमीटर दूर तखतपुर विधानसभा का इलाका शहर के उस्लापुर से लेकर कोटा-लोरमी के जंगलों तक फैला हुआ है। यह एक सामान्य सीट है, लेकिन यहां जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को काफी प्रभावित करते हैं. इस सीट में अनुसूचित जाति के वोटर निर्णायक भूमिका में होते हैं। तखतपुर विधानसभा सीट पहले बीजेपी के मजबूत किलों में शुमार थी क्योंकि 2018 के पहले के विधानसभा चुनावों में ज्यादातर इस सीट से बीजेपी के ही प्रत्याशी जीतते आए थे। कांग्रेस यहां दूसरे नंबर पर ही रही थी। मगर 2018 में कांग्रेस ने तखतपुर में तख्तापलट कर दिया। पहले यह क्षेत्र बीजेपी के कद्दावर नेता और मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके मनहरण लाल पांडेय के कारण भी जाना जाता था। 90 के दशक में साल 1996 में उनके लोकसभा जाने के बाद पहली बार कांग्रेस के बलराम सिंह यहां से विधायक चुने गए. इसके बाद 1998 में बीजेपी ने वापस सीट पर कब्जा किया. लेकिन 2003 में बलराम सिंह ठाकुर दूसरी बार चुनाव जीतकर सीट को कांग्रेस के पाले में डाल दिया.

2003 के चुनाव में कांग्रेस के बलराम सिंह और बीजेपी के जगजीत सिंह मक्कड़ के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। इस चुनाव में बलराम सिंह को 39 हज़ार 362 वोट मिले थे तो वहीं जगजीत सिंह मक्कड़ 32 हज़ार 671 वोट ही हासिल कर पाए और इस तरह 2003 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस का परचम लहराया। साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदलते हुए राजू सिंह को चुनावी मैदान में उतारा वहीं कांग्रेस ने अपने पूर्व प्रत्याशी और सिटिंग एमएलए बलराम सिंह पर दोबारा भरोसा जताया मगर इस बार कांग्रेस का भरोसा टूट गया। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी राजू सिंह को 43 हज़ार 431 वोट मिले जबकि तत्कालीन विधायक बलराम सिंह 37 हज़ार 838 वोटों में ही सिमट गए और इस तरह यह सीट कांग्रेस के हाथ से चली गई।

इसके बाद आया 2013 का विधानसभा चुनाव। इस चुनाव में बीजेपी ने अपने तत्कालीन विधायक राजू सिंह को ही टिकट दी जिन्हें कुल 44 हज़ार 735 वोट मिले तो वहीं कांग्रेस के अशीष सिंह को 44 हज़ार 127 वोट मिले थे. जीत का फासला एकदम कांटे की टक्कर का साबित हुआ। साल 2018 के विधानसभा चुनावों में मुकाबला त्रिकोणीय था क्योंकि अब न सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस बल्कि एक तीसरा दल भी प्रदेश की राजनीती में उभरा था। साल 2016 में कांग्रेस से अलग होकर पूर्व मुख्यमंत्री स्व अजित जोगी अपनी नई पार्टी जेसिसीजे के साथ तखतपुर विधानसभा सीट पर अपना प्रत्याशी मैदान में उतारा और भाजपा ने प्रत्याशी बदलते हुए हर्षिता पांडे को प्रत्याशी बनाया था वहीं कांग्रेस ने पूर्व प्रत्याशी आशीष सिंह ठाकुर की पत्नी रश्मि सिंह ठाकुर को टिकट दिया। जकांछ के प्रत्याशी संतोष कौशिक दोनों राष्ट्रीय पार्टी के लिए चुनौती बनकर उभरे थे।

इस बार तखतपुर के राजनीतिक विश्लेषकों भी यह अनुमान नहीं लगा पाए कि इस बार जीत किस पार्टी की रहेगी। क्योंकि मतदाता इस बार खामोश रहे। इस बार लोग कांग्रेस, भाजपा के पक्ष में माहौल बताते। वहीं तीनों प्रत्याशी अपने-अपने जीत को लेकर आश्वस्त नजर आए लेकिन जब मतगणना हुई तो परिणाम में कांग्रेस की रश्मि से ठाकुर ने अपने निकट्तम प्रतिद्वंदी संतोष कौशिक को 2991 मतों से पराजित कर जीत दर्ज की। यह एक इतिहास बन गया क्योंकि अभी तक तखतपुर विधानसभा से पुरुष ही विधायक हुआ करते थे लेकिन पहली बार इस सीट से कोई महिला विधायक निर्वाचित हुई।बहरहाल अगली बार बीजेपी, कांग्रेस, जेसिसीजे के अलावा आम आदमी पार्टी भी इस चुनाव में किस्मत आज़मा सकती है।

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