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दोहा में ‘शांति’ का पाखंड! अमेरिकी धमकियों के बीच ईरान का अल्टीमेटम—’मासूमों के खून का हिसाब हुए बिना कोई स्थायी डील नहीं!

अमेरिका-ईरान संबंध

आज जब अमेरिका अपना 250वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब वाशिंगटन से लेकर कतर की राजधानी दोहा तक कूटनीतिक बारूद सुलग रहा है। फरवरी 2026 में भड़के भीषण युद्ध के बाद, जिसमें अमेरिकी-इजरायली मिसाइलों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की जान ले ली थी, अब दोनों देश दोहा में तकनीकी शांति वार्ता की मेज पर आमने-सामने हैं। लेकिन इस तथाकथित ‘शांति वार्ता’ के पीछे का सच बेहद खौफनाक और आक्रामक है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका की दादागिरी के आगे घुटने टेकने वाला नहीं है।

ईरान के उप-विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने वाशिंगटन को कड़े लहजे में चेतावनी दी है कि जब तक लेबनान और खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी समर्थित आक्रामकता पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक किसी भी स्थायी शांति समझौते की उम्मीद करना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल होगी। ईरान ने अमेरिका के सामने दो टूक शर्त रखी है: कतर के बैंकों में फ्रीज किए गए उसके 6 अरब डॉलर के तेल राजस्व को बिना किसी शर्त के तुरंत रिलीज किया जाए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में ईरानी संप्रभुता को चुनौती देना बंद किया जाए।

उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड से लेकर दोहा तक अपने उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस और विशेष दूतों के जरिए ईरान को घेरने की कोशिश की है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि वार्ता में ‘सकारात्मक प्रगति’ हुई है, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका इस समय ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल बेड़े को पूरी तरह पंगु बना देना चाहता है। ईरान ने अमेरिका के इस मंसूबे को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ईरानी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी रक्षा प्रणालियों पर कोई समझौता नहीं करेंगे। अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में विदेशी जहाजों के लिए कड़े नियम लागू कर दिए हैं, जिससे वैश्विक तेल व्यापार पर संकट गहरा गया है। यह शांति वार्ता नहीं, बल्कि एक नए और भीषण युद्ध की पूर्वपीठिका है, जहाँ दोनों देश एक-दूसरे को नेस्तनाबूद करने की फिराक में हैं।

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