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क्या भारत में लोकतंत्र बचा है या अघोषित इमरजेंसी लागू है? दिल्ली में कोहराम और हजारों गिरफ्तारियों पर भड़की सियासत!

दिल्ली की सड़कों पर आज तानाशाही और लोकतंत्र के बीच आर-पार की जंग छिड़ चुकी है। राजधानी को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है, जहां आम नागरिकों की आवाजाही पर पहरा बैठाकर हजारों लोगों को जबरन हिरासत में लिया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और चुनावी सुधारों की मांग को लेकर उठी आवाज़ों को कुचलने के लिए प्रशासन ने जो खौफनाक तरीका अपनाया है, उसने पूरे देश को सकते में डाल दिया है। स्टेडियमों और थानों को खुली जेल बना दिया गया है, जहाँ हज़ारों बेकसूर प्रदर्शनकारियों को ठूँस दिया गया है।

राजधानी दिल्ली आज पूरी तरह पुलिस के पहरे और पाबंदियों के साए में कैद नजर आई। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उठी विरोध की आंधी को रोकने के लिए सत्ता ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे छात्रों, वकीलों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों और होटलों से चुन-चुनकर उठाया गया। हालात इतने बदतर हो गए कि स्टेडियमों और कम्युनिटी सेंटर्स को अस्थाई जेलों में बदलना पड़ा, जहाँ लगभग 7,000 लोगों को नजरबंद किया गया। इस क्रूर कार्रवाई के खिलाफ जब विपक्षी नेताओं और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने तीखे सवाल दागे, तो सरकार की नीयत पर देशव्यापी बहस छिड़ गई कि क्या यह जनतंत्र है या तानाशाही का काला साया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए वकीलों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का निर्देश दिया, लेकिन सवाल यह है कि जनता की आवाज दबाने के इस खौफनाक खेल का जिम्मेदार कौन है?

यह साफ हो चुका है कि ताक़त के बल पर जनता के आक्रोश को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। सत्ता के गलियारों में बैठे नुमाइंदों को यह समझना होगा कि असहमति की आवाज़ों को सलाखों के पीछे धकेलने से लोकतंत्र मजबूत नहीं बल्कि कमज़ोर होता है। जनता अब खामोश बैठने वाली नहीं है और जवाबदेही की यह लड़ाई आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप लेगी।

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