जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड द्वारा जुमे की नमाज के दौरान दिए जाने वाले खुत्बे (उपदेश) के विषयों को लेकर जारी नए प्रस्ताव ने देश की राजनीति में जबरदस्त भूचाल ला दिया है। बोर्ड के इस कदम को धार्मिक मामलों में सीधा सरकारी और प्रशासनिक हस्तक्षेप करार देते हुए तमाम राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार सुनियोजित तरीके से धार्मिक स्वतंत्रता की धज्जियां उड़ा रही है और स्वायत्तता पर पूरी तरह कब्जा करना चाहती है। हालांकि, वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन दरख्शां अंदर्बी ने सफाई देते हुए कहा है कि कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया था और यह केवल सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक सुझाव था। लेकिन इसके बावजूद नेताओं और उलेमाओं का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। उनका साफ कहना है कि धार्मिक मामलों और उपदेशों की रूपरेखा तय करने का हक सिर्फ उलेमाओं और विद्वानों का है, न कि किसी सरकारी मशीनरी का। यह विवाद अब तेजी से तूल पकड़ रहा है और आने वाले दिनों में एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा करने की पूरी क्षमता रखता है।
धार्मिक स्वतंत्रता के हनन की यह कोशिश किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन को अपनी हदें पार करने का कोई अधिकार नहीं है।
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