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बांस के धनुष से शुरू हुआ सफर, अब एशियाई खेलों और ओलंपिक पर नजर—कोमालिका की दमदार वापसी की तैयारी!

रायपुर। 2021 में इतिहास रचते हुए कोमालिका बारी ने विश्व कैडेट और विश्व जूनियर दोनों खिताब जीतकर भारत की दूसरी महिला रिकर्व तीरंदाज बनने का गौरव हासिल किया था। इस उपलब्धि के बाद जमशेदपुर की इस खिलाड़ी से उम्मीदों का पहाड़ खड़ा हो गया।

हालांकि जूनियर स्तर पर शानदार प्रदर्शन के बावजूद सीनियर सर्किट में उनकी राह आसान नहीं रही। एशियाई खेलों और 2028 ओलंपिक जैसे बड़े मंचों के लिए भारतीय टीम में जगह बनाने की जद्दोजहद अभी जारी है।

अब 2026 एशियाई खेलों के चयन की अंतिम दौड़ शुरू हो चुकी है और कोमालिका ने अपनी तैयारी को नई रफ्तार दे दी है। पुणे के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में वह तकनीक के साथ-साथ मानसिक मजबूती पर खास फोकस कर रही हैं। उनका मानना है कि दबाव में बेहतर प्रदर्शन ही बड़े मुकाबलों में सफलता की कुंजी है।

कोमालिका फिलहाल टॉप-16 में जगह बनाए हुए हैं और लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अनुभव बढ़ा रही हैं। उनका साफ लक्ष्य है—2028 ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना।

झारखंड की यह प्रतिभाशाली तीरंदाज इन दिनों रायपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। यहां वह व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित स्पर्धाओं में अपनी प्रतिभा का दम दिखा रही हैं।

उनकी कहानी संघर्ष से भरी है। महज 12 साल की उम्र में तीरंदाजी शुरू करने वाली कोमालिका ने शुरुआती दिनों में बांस से बने धनुष से अभ्यास किया। आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी मां ने हमेशा उनका साथ दिया। रोज 18 किलोमीटर साइकिल चलाकर टाटा आर्चरी अकादमी पहुंचना उनके जुनून का सबसे बड़ा सबूत है।

कोमालिका मानती हैं कि उतार-चढ़ाव खेल का हिस्सा हैं, लेकिन मेहनत और मजबूत इरादों से हर चुनौती को पार किया जा सकता है। अब वह सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि जनजातीय बच्चों को इस खेल की ओर प्रेरित करने के मिशन पर भी काम कर रही हैं।

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