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विदेश नीति का नया मील का पत्थर या मल्टी-अलाइनमेंट की चुनौती?

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने से पहले भारत का पक्ष बड़े आत्मविश्वास और आक्रामकता से रखा था। लेकिन अगस्त में अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की टिप्पणी ने सबको हिला दिया — अगर पुतिन और ट्रंप की अलास्का बातचीत सफल नहीं हुई, तो भारत पर 25% तक टैरिफ़ बढ़ सकता है।

फ्रांस के जियोपॉलिटिक्स विशेषज्ञ अरनॉड बरट्रैंड ने इस पर कड़ा विश्लेषण दिया — “भारत की मल्टी-अलाइनमेंट रणनीति अब सवालों के घेरे में है। यह रणनीति भारत को ‘सबके लिए जरूरी’ बनने की जगह ‘सबके लिए जोखिम रहित निशाना’ बना रही है।”

अरनॉड कहते हैं, “जब आप सबके दोस्त बनने की कोशिश करते हैं, तो आप हर किसी के दबाव का वॉल्व बन जाते हैं, खासकर जब अपनी बात मनवाने की ताकत कमजोर हो।”

मल्टी-अलाइनमेंट, जो नेहरू के नॉन-अलाइनमेंट का आधुनिक रूप है, अब कहीं न कहीं उलझनों में फंसा नजर आता है। 15 अगस्त को अलास्का में पुतिन-ट्रंप की गर्मजोशी के बीच ये सवाल उठता है — क्या भारत की बहु-मुखी नीति अपने उद्देश्य से भटक रही है?

लेकिन छह दिन बाद, 19 अगस्त को पीएम मोदी की चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाक़ात ने शायद इस कड़ी में एक नई उम्मीद जगाई है।

क्या भारत अपनी रणनीति को फिर से मजबूत कर पाएगा? या यह बहुराष्ट्रीय रिश्तों की जंजाल में फंसता जाएगा?

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