लाल किले से RSS की शताब्दी का उद्घोष: पीएम मोदी का भाषण बना राजनीतिक बहस का केंद्र

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने 12वें भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की 100वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए उसे “राष्ट्र सेवा का स्वर्णिम अध्याय” करार दिया। अपने संबोधन में उन्होंने स्वयंसेवकों की भूमिका को देश निर्माण में अहम बताया और कहा कि “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक का सफर संघ ने समर्पण से तय किया है।”
यह बयान न केवल ऐतिहासिक था, बल्कि राजनीतिक हलकों में इसे एक साहसिक और विवादास्पद वक्तव्य माना जा रहा है, जिसने स्वतंत्रता दिवस के मंच को विचारधारा की नई ज़मीन में तब्दील कर दिया।
पीएम मोदी ने कहा,
100 वर्ष पूर्व एक संगठन का जन्म हुआ—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। राष्ट्र की सेवा के 100 वर्ष एक गौरवपूर्ण, स्वर्णिम अध्याय हैं। एक तरह से, आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब आमतौर पर आरएसएस को स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसरों पर सीधे उल्लेख से दूर रखा जाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह टिप्पणी प्रधानमंत्री की वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठन के प्रति खुली प्रशंसा को दर्शाती है।
कांग्रेस का तीखा हमला: “52 साल तक तिरंगे से परहेज़?”
प्रधानमंत्री के इस बयान पर कांग्रेस ने तीव्र प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आरोप लगाया कि: “आरएसएस ने 52 वर्षों तक तिरंगा नहीं फहराया, भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया, और ब्रिटिश सेना में शामिल होने की अपील की थी। स्वतंत्रता संग्राम में आरएसएस की भूमिका नगण्य रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या ऐसे संगठन को स्वतंत्रता दिवस जैसे पवित्र दिन पर महिमामंडित करना उचित है?
जयराम रमेश की टिप्पणी: “यह सत्ता विस्तार की बिसात है”
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा: प्रधानमंत्री अब आरएसएस की दया और मोहन भागवत के आशीर्वाद पर निर्भर हैं। यह स्वतंत्रता दिवस के मंच का राजनीतिकरण है। प्रधानमंत्री थक चुके हैं और यह बयान उनके कार्यकाल के विस्तार की तैयारी है।”
राजनीतिकरण या विचारधारा की अभिव्यक्ति?
प्रधानमंत्री मोदी के बयान ने एक नई बहस को जन्म दिया है—क्या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय उत्सव का मंच राजनीतिक और वैचारिक घोषणाओं के लिए उपयुक्त है? विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम प्रधानमंत्री के वैचारिक आग्रह को दर्शाता है, लेकिन इसने इस मंच की पारंपरिक गैर-राजनीतिक गरिमा पर प्रश्नचिह्न भी लगा दिया है।