जंग के मुहाने से बातचीत की मेज तक: पेट्रो की 35 मिनट की कॉल ने बदला ट्रंप का तेवर

पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका और कोलंबिया के रिश्ते ऐसे तल्ख हो गए थे, मानो किसी भी पल हालात काबू से बाहर हो जाएं। बयानबाजी की आग इतनी तेज थी कि लैटिन अमेरिका में जंग जैसे हालात बनने लगे थे। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दूसरी ओर कोलंबियाई राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो—दोनों के शब्द हथियार बन चुके थे।
तनाव की चिंगारी तब भड़की, जब 3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़ा हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। ट्रंप ने इसे ड्रग ट्रैफिकिंग के खिलाफ बड़ी जीत बताया, लेकिन पेट्रो ने इसे क्षेत्रीय संप्रभुता पर सीधा हमला करार दे दिया। इसके बाद ट्रंप का गुस्सा फूट पड़ा—कोलंबिया को “बीमार देश” कहने से लेकर सैन्य कार्रवाई तक के संकेत दिए गए। पहले से ही पेट्रो का वीजा रद्द, प्रतिबंध और कूटनीतिक दबाव रिश्तों को और बिगाड़ चुका था।
जवाब में पेट्रो भी पीछे हटने वाले नहीं थे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर बम गिरे तो गुरिल्ला फिर पहाड़ों में लौटेंगे। कोलंबिया ने वेनेजुएला सीमा पर 30 हजार सैनिक तैनात कर दिए, देशभर में प्रदर्शन भड़क उठे और पेट्रो के विद्रोही तेवर ने माहौल को और विस्फोटक बना दिया। दुनिया को लगने लगा था कि टकराव अब टलना मुश्किल है।
लेकिन इसी तनाव के बीच आया एक अप्रत्याशित मोड़। सोमवार को पेट्रो ने ट्रंप को फोन मिलाया। करीब 35 मिनट की इस बातचीत में ड्रग्स विवाद, कोलंबिया की जमीनी हकीकत और आपसी गलतफहमियों पर खुलकर चर्चा हुई। नतीजा—ट्रंप का रुख अचानक नरम पड़ गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कॉल की तारीफ की और व्हाइट हाउस में मुलाकात के संकेत दे दिए। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच बैठक की तैयारी भी शुरू हो गई।
इस ‘फोन दांव’ ने जंग के साए में खड़े रिश्तों को बातचीत की राह पर ला खड़ा किया। विशेषज्ञ मानते हैं कि पेट्रो की सख्त जमीन और फिर संवाद की पहल ने ट्रंप को रणनीति बदलने पर मजबूर किया। अब नजरें आने वाली बैठक पर हैं, जहां ड्रग्स, सुरक्षा और द्विपक्षीय रिश्तों का भविष्य तय होगा। यह सिर्फ दो देशों की कहानी नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका में अमेरिकी नीति की बड़ी परीक्षा भी मानी जा रही है।


