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6 दिसंबर 1992: ऐतिहासिक दिन और उसके बाद की तबाही

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का गिरना एक ऐसा मोड़ बना जिसने देश की राजनीति, समाज और सुरक्षा को गहरे रूप से झकझोरा। उस दिन रथ-यात्रा और कारसेवकों के संयुक्त कार्यक्रम के दौरान भीड़ ने मस्जिद पर चढ़कर उसे ध्वस्त कर दिया — घटना पूरे दिन चलने वाले भाषणों और तनाव के बीच सुबह से शाम तक एक-एक कर हुई। इस घटना के बाद देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिनमें अनुमानित तौर पर लगभग 2,000 लोग मारे गए और अरबों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।

घटना की पृष्ठभूमि लंबी और जटिल थी — 19वीं सदी से चल रहे दावों, 1980 के दशक में वीएचपी और भाजपा द्वारा छेड़े गए आंदोलन और 1990 के आसपास तेज हुई रथ यात्राओं ने माहौल गरम कर दिया था। प्रशासन के पास कारसेवियों के ‘शांतिपूर्ण पूजा’ के दावे थे, मगर बड़ी तादाद में लेकर आए औज़ार और हथियार, सुरक्षा व्यवस्था की गड़बड़ी और कथित रूप से कुछ नेताओं के भाषणों ने स्थिति नियंत्रित रहना असंभव बना दिया। उस आपदा की जांच के बाद बनाई गई लिबरहान आयोग रिपोर्ट में 68 लोगों के नाम जिम्मेदारों के रूप में बताए गए।

बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद महाराष्ट्र के मुंबई शहर में भी बड़े दंगे हुए — वहां अनुमानित रूप से करीब 900 लोग मारे गए और इन घटनाओं ने आगे चलकर 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट जैसी हिंसात्मक घटनाओं का भी रास्ता दिया।

उन गांवों और शहरों में जिन पर यह झगड़ा काबिज रहा, लंबे समय तक सामुदायिक तनाव, विस्थापन और आर्थिक पतन देखने को मिला। कई बार कहा गया कि अगर प्रशासनिक एवं राजनैतिक नेतृत्व समय रहते सक्रिय होता तो इस तबाही को कम या रोका जा सकता था — पर सियासी संतुलन और राजनीतिक लाभ के कारण मामलों का समाधान टलता गया।

पाकिस्तान में क्या हुआ — घटना का अंतरराष्ट्रीय प्रतिकर

बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने की खबर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही — पड़ोसी देशों में भी तीव्र प्रतिक्रियाएं आईं। पाकिस्तान में उसके बाद बड़े पैमाने पर हिंदू स्थल और संपत्ति पर हमले हुए; रिपोर्टों के अनुसार एक ही दिन में करीब 30 से अधिक हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया और हिंदू समुदाय के लोग निशाना बने — दुकानों व घरों में आग लगाई गई और व्यापक सांप्रदायिक हिंसा फैली। पाकिस्तान सरकार ने 7 दिसंबर को ऑफिस और स्कूल बंद कर दिये और भारत के तत्कालीन राजदूत को तलब कर आपत्ति दर्ज कराई।

यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया, साथ ही बंगलादेश और गल्फ देशों में भी विरोध-प्रदर्शन और हमले, न केवल भारत के भीतर तनाव बढ़ाने का कारण बनीं बल्कि इस घटना ने क्षेत्रीय स्तर पर भी धार्मिक-राजनीतिक तनाव को हवा दी।

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