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दूध बेचने से लेकर गोल्ड मेडल तक, हमाम हुसैन की संघर्ष भरी जीत

रायपुर। जम्मू-कश्मीर के जोरावर गांव के रहने वाले 28 वर्षीय हमाम हुसैन की कहानी संघर्ष, जिम्मेदारी और जुनून का अनोखा उदाहरण है। जब वे कुश्ती के अखाड़े में पसीना नहीं बहा रहे होते, तब अपने बड़े भाई के साथ घर-घर दूध पहुंचाकर परिवार की जिम्मेदारी निभाते हैं।

पांच साल पहले पिता के निधन के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी दोनों भाइयों पर आ गई। बड़े भाई ने कुश्ती छोड़कर दूध का काम संभाला, जबकि हमाम ने उनके सहयोग से अपने खेल के सपने को जिंदा रखा।

इसी मेहनत का नतीजा खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में देखने को मिला, जहां हमाम ने पुरुषों के 79 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में हिमाचल प्रदेश के मोहित कुमार को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह उनके 14 साल के करियर का पहला राष्ट्रीय गोल्ड है।

हमाम बताते हैं कि उनके भाई ने हर कदम पर उन्हें प्रेरित किया और दंगलों में साथ लेकर जाते रहे। परिवार की आजीविका का साधन पिता की छोड़ी भैंसें बनीं, जिनसे दूध बेचकर घर चलता रहा।

सीमित संसाधनों के बावजूद हमाम ने हार नहीं मानी। वे रोज करीब 20 किलोमीटर दूर गांव के अखाड़े में अभ्यास करते हैं और मैट ट्रेनिंग के लिए 40 किलोमीटर दूर जम्मू तक का सफर तय करते हैं।

उनके पास निजी कोच नहीं है, लेकिन गांव के सीनियर पहलवानों से मार्गदर्शन मिलता है। उनका मानना है कि अगर बेहतर सुविधाएं मिलें, तो गांवों के खिलाड़ी भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

हमाम के लिए यह गोल्ड मेडल सिर्फ जीत नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और सपनों की जीत है।

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