लैलूंगा का ‘केलो’ जंवाफूल चावल बना पहचान, किसानों की आय बढ़ाने में निभा रहा अहम भूमिका

रायपुर। रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र में उगाया जाने वाला ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल अपनी खास सुगंध, बेहतरीन स्वाद और उच्च गुणवत्ता के चलते अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है। पारंपरिक धान की यह किस्म आज किसानों के लिए मजबूत आय का स्रोत बन चुकी है। प्रशासन और कृषि विभाग के सहयोग से इसके उत्पादन और विपणन को संगठित रूप दिया जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
प्रदेश सरकार के नेतृत्व में किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनका सकारात्मक असर अब जमीन पर दिखने लगा है। कृषि उन्नति योजना और भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना जैसी पहल ने किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मदद की है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, जंवाफूल चावल की खासियत इसकी प्राकृतिक खुशबू और स्वाद है, जो लैलूंगा की अनुकूल जलवायु—दिन में गर्मी और रात में हल्की ठंडक—के कारण विकसित होती है। यही वजह है कि इस क्षेत्र का चावल अलग पहचान रखता है और बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
अब इस चावल की मांग छत्तीसगढ़ से बाहर भी बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। करीब 150 रुपये प्रति किलो के बाजार मूल्य के साथ किसानों को अच्छा लाभ मिल रहा है, वहीं बीज भी 70 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है।
लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल बताते हैं कि जंवाफूल चावल की खेती से उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये से अधिक की आय हो रही है। वहीं, खैरबहार के किसान भवानी पंडा पूरी तरह जैविक पद्धति से खेती करते हुए इसे और बड़े स्तर पर बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
प्रशासन द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साथ ही एफपीओ और किसान समूहों के माध्यम से उत्पादन और विपणन को मजबूत किया जा रहा है। पिछले वर्ष 700 एकड़ में हुई खेती को इस वर्ष बढ़ाकर 2000 एकड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे अधिक किसान इस लाभकारी फसल से जुड़ सकें।




