कम लागत–ज्यादा कमाई: गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में लेमनग्रास खेती ने बदली छोटे किसानों की किस्मत

रायपुर। लेमनग्रास की खेती अब छोटे और सीमांत किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है। कम लागत में तैयार होने वाली यह फसल बंजर जमीन पर भी आसानी से उगाई जा सकती है और खास बात यह है कि यह कीटों व जंगली जानवरों से भी काफी हद तक सुरक्षित रहती है। एक बार रोपाई के बाद कई वर्षों तक लगातार कटाई से उत्पादन मिलने के कारण किसानों की आमदनी बढ़ रही है और वे आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला जंगलों से घिरा क्षेत्र है, जहां कई किसान बेहद कम जमीन में खेती करते हैं। कई परिवारों के पास तो एक एकड़ से भी कम भूमि है, जिस वजह से पहले उन्हें मजदूरी या शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। अब औषधीय और सुगंधित पौधों को बढ़ावा देने की पहल के तहत लेमनग्रास की खेती को योजनाबद्ध तरीके से शुरू किया गया है।
इस योजना में किसानों को क्लस्टर मॉडल से जोड़ा गया और बुवाई से पहले ही तेल खरीदने वाली कंपनियों से अनुबंध कराया गया। उद्योगों ने किसानों को बोरवेल, जुताई, पौधारोपण, फेंसिंग जैसे कामों के लिए अग्रिम सहायता दी, जिसे किसान फसल बेचने के बाद धीरे-धीरे वापस करते हैं। वहीं किसानों को लेमनग्रास की स्लिप्स मुफ्त दी गईं और तेल निकालने के लिए डिस्टिलेशन यूनिट भी लगाई गई।
आज जिले के 4 क्लस्टरों—खरड़ी, पंडरी, अमारू और हरड़ी—के 123 किसान करीब 230 एकड़ में लेमनग्रास की खेती कर रहे हैं। बहरी-जोरकी गांव के किसान अगहन सिंह ने सिर्फ 35 डिसमिल जमीन पर लेमनग्रास लगाकर अच्छी कमाई की शुरुआत की। पहली कटाई में उन्हें 4 लीटर तेल मिला और दूसरी कटाई में 8 लीटर तक तेल उत्पादन हुआ। इस तरह साल भर में उन्हें 12 हजार रुपये की आय हुई, जो आगे 5 वर्षों तक जारी रह सकती है।
लेमनग्रास की खेती ने इलाके में रोजगार के नए अवसर बढ़ाए हैं, पलायन में कमी आई है और छोटे किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं। कम जमीन वाले किसानों के लिए यह फसल अब सच में “वरदान” साबित हो रही है।




