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अब बहुत नजदीक है 31 मार्च की डेडलाइन, क्या छग से अब सच में खत्म होगा नक्सलवाद?

31 मार्च 2026, यह वो तारिख है जिसे नक्सालवाद के खात्मे की डेडलाइन कहा जा रहा है..केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सबसे पहले 20 सितंबर 2024 को नई दिल्ली में नक्सल हिंसा के पीड़ितों से बातचीत में कहा था कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद का अंत होगा। फिर इसके बाद दिसंबर 2024 को अपने छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान एक प्रेस कांफ्रेंस में केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य को भी मार्च 2026 तक नक्सलवाद से मुक्त किया जाएगा। और अब छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगलों में दशकों से चल रही नक्सल हिंसा अब अपने सबसे निर्णायक दौर में पहुंचती नजर आ रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन अब जब इस डेडलाइन में कुछ ही दिन बचे हैं, ऐसे में वर्तमान का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सच में नक्सलवाद खत्म होने की कगार पर है या अभी भी चुनौती बाकी है।

आज फोर्थ आई न्यूज़ की इस ख़ास रिपोर्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं कि दशकों पुरानी नाक्सालवाद के खिलाफ यह लड़ाई अब किस मुहाने पर खड़ी है…दरअसल पिछले दो सालों में सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ सबसे आक्रामक अभियान चलाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2024 से अब तक छत्तीसगढ़ में 2100 से ज्यादा नक्सलियों ने सरेंडर किया है, करीब 1785 नक्सली गिरफ्तार हुए हैं और लगभग 477 नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए हैं। सिर्फ यही नहीं, केन्द्रीय स्तर पर इन आंकड़ों की तस्वीर और भी बड़ी दिखाई देती है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2024 में 881 नक्सलियों ने सरेंडर किया था, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 2337 तक पहुंच गई। इसी दौरान 2024 में 290 और 2025 में 317 नक्सली मारे गए। यानी साफ है कि सुरक्षा ऑपरेशन का दबाव लगातार बढ़ रहा है और बड़ी संख्या में नक्सली या तो मारे जा रहे हैं या फिर हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट रहे हैं।

इस दौरान कई बड़े नक्सली नेताओं पर भी कार्रवाई हुई है। हाल ही में बड़े ऑपरेशन के दौरान सीपीआई माओवादी संगठन के शीर्ष नेता नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू जैसे बड़े कमांडर को सुरक्षा बलों ने ढेर किया। इनमें सबसे बड़ा नाम मडावी हिडमा का था 2025 में सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई में हिड़मा मारा गया,जिससे नक्सली सन्गठन की ताकत कमज़ोर हुई…इनके नेटवर्क को बड़ा झटका लगा। वहीं इस दौरान कई बड़े इनामी नक्सलियों ने भी आत्मसमर्पण किया है। इनमें टी वासुदेव राव, रणिता, भास्कर नंदे जैसे वरिष्ठ कैडर शामिल रहे, जिन पर लाखों से लेकर करोड़ रुपये तक का इनाम था। सिर्फ ऑपरेशन ही नहीं, रणनीति भी बदली है। बस्तर इलाके में 52 नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बनाए गए, जिससे सुरक्षा बल अब जंगलों के अंदर तक पहुंच बना पा रहे हैं। इससे नक्सलियों की आवाजाही और लॉजिस्टिक नेटवर्क पर बड़ा दबाव बना है।

सरकार का दावा है कि अब कई इलाके लगभग नक्सलमुक्त हो चुके हैं। खासकर अबूझमाड़ और उत्तर बस्तर के कई इलाके, जो कभी नक्सलियों के सबसे बड़े गढ़ माने जाते थे, अब नक्सल प्रभाव से काफी हद तक मुक्त घोषित किए जा चुके हैं। लेकिन चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दक्षिण बस्तर के कुछ हिस्सों — खासकर बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर जैसे जिलों में अभी भी नक्सल गतिविधियां मौजूद हैं और सुरक्षा बल लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अब नक्सल संगठन की ताकत पहले जैसी नहीं रही। संगठन के कई बड़े नेता मारे जा चुके हैं, बड़ी संख्या में कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं और उनके कई गढ़ों में सुरक्षा बलों के कैंप बन चुके हैं।

लेकिन इसके बावजूद जंगलों का भौगोलिक इलाका, सीमावर्ती राज्यों से संपर्क और कुछ हार्डकोर कमांडरों की मौजूदगी अभी भी चुनौती बनी हुई है। नक्सल खात्मे की डेडलाइन के पहले अब तस्वीर दो हिस्सों में बंटी नजर आती है। एक तरफ सरकार का दावा है कि नक्सलवाद अब अपने आखिरी दौर में है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि बस्तर के कुछ इलाकों में अभी भी ऑपरेशन जारी हैं। अब सवाल यही है कि 31 मार्च 2026 की डेडलाइन आने में बहुत कम दिन बचे हैं। ऐसे में क्या सच में दशकों पुरानी इस समस्या का अंत होने वाला है या फिर नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अभी और लंबी चलेगी।

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