500% टैरिफ की धमकी और नई जियोपॉलिटिक्स: अमेरिका बनाम दुनिया, बदलता विश्व संतुलन

अमेरिका एक बार फिर अपनी वैश्विक ताकत का इस्तेमाल कानून के ज़रिए करने की तैयारी में है। प्रस्तावित कानून ‘Sanctioning Russia Act of 2025’ साफ संदेश देता है—रूस से तेल या यूरेनियम खरीदोगे, तो अमेरिका में तुम्हारे उत्पाद महंगे पड़ेंगे। इस कानून के तहत ऐसे देशों पर 500% तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
इस कदम से अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं, बल्कि वे देश भी हैं जो अपनी ऊर्जा और रणनीतिक ज़रूरतों के लिए रूस से जुड़े हुए हैं। भारत और चीन इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं, क्योंकि दोनों ही देश बड़े पैमाने पर रूसी तेल आयात कर रहे हैं।
भारत और अमेरिका दोस्त जरूर हैं, लेकिन रूस से तेल खरीदने के सवाल पर मतभेद गहरे हैं। भारत सस्ती ऊर्जा को अपनी आर्थिक जरूरत और रणनीतिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है, जबकि अमेरिका इसे रूस को कमजोर करने की नीति का हिस्सा मानता है। यही वजह है कि एक तरफ दबाव की राजनीति चल रही है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश।
चीन के साथ अमेरिका की लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि तकनीक, AI, चिप्स, ताइवान और इंडो-पैसिफिक में वर्चस्व की है। वहीं ईरान का परमाणु कार्यक्रम, रूस का सैन्य प्रभाव, यूक्रेन के खनिज संसाधन, तुर्की का रूस से हथियार सौदा और वियतनाम की रणनीतिक तटस्थता—ये सभी अमेरिका के लिए अलग-अलग मोर्चों पर चुनौती बन चुके हैं।
तेल से भरपूर वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी कार्रवाई भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जहां सत्ता और ऊर्जा संसाधनों पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश साफ दिखती है।
असल डर यह है कि दुनिया ‘वन सुपरपावर’ से ‘मल्टीपोलर वर्ल्ड’ की ओर बढ़ रही है। डॉलर का दबदबा कमजोर हो रहा है, चीन-रूस स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं और टेक्नोलॉजी की दौड़ में अमेरिका की बढ़त को चुनौती मिल रही है।
इसी के जवाब में अमेरिका कभी प्रतिबंध लगाता है, कभी टैरिफ की धमकी देता है, तो कभी दोस्ती और ताकत का प्रदर्शन करता है। दूसरी ओर, BRICS और ‘ग्लोबल साउथ’ के देश मिलकर एक नए विश्व व्यवस्था की नींव रखने में जुटे हैं, जहां हर देश अपने हितों को पहले रखेगा। भारत इस बदले हुए वैश्विक समीकरण में एक मजबूत आवाज़ बनकर उभर रहा है।

