रंगों में बसी छत्तीसगढ़ की आत्मा, रायपुर साहित्य उत्सव में चित्रकला ने मोहा मन

नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन परिसर में चल रहे रायपुर साहित्य उत्सव में इस बार शब्दों के साथ-साथ रंगों की भी खास मौजूदगी देखने को मिल रही है। सुरेंद्र दुबे मंडप में आयोजित चित्रकला प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को बेहद जीवंत ढंग से उकेरा गया है। यहां लगी तस्वीरें दर्शकों को प्रदेश की आत्मा से जोड़ने का काम कर रही हैं।
प्रदर्शनी में सबसे पहले ध्यान खींचती है छत्तीसगढ़ महतारी की भावपूर्ण तस्वीर, जिसमें पंडवानी का तंबूरा, हंसिया, धान की बालियां और आशीर्वाद देती मुद्रा छत्तीसगढ़ की पहचान को सशक्त रूप में सामने लाती है। इस चित्र को रायपुर की कलाकार सोनल शर्मा ने रचा है। वहीं अवध कंवर की पेंटिंग में बस्तर का बाजार पूरी जीवंतता के साथ उभरता नजर आता है, जो कविता और चित्रकला के सुंदर संगम का अहसास कराता है।
जांजगीर की कलाकार दिव्या चंद्रा द्वारा बनाया गया राजिम कुंभ का चित्र अपनी दिव्यता से दर्शकों को आकर्षित करता है, जिसे देखकर तीर्थ की पावन ऊर्जा महसूस होती है। रामगढ़ की पहाड़ियों पर आधारित चित्र दर्शकों को कालिदास और उनकी रचना ‘मेघदूतम्’ की स्मृति तक ले जाते हैं।
कार्यशाला संयोजक भोजराज धनगर ने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर यह भव्य चित्रकला प्रदर्शनी आयोजित की गई है। इसके साथ ही पेंटिंग और कार्टून कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जा रहा है, जहां युवा कलाकारों को अनुभवी चित्रकारों से प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल रहा है।
साहित्य उत्सव में कला प्रेमियों, विद्यार्थियों और आम दर्शकों की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है। रंग और शब्दों के इस संगम ने रायपुर साहित्य उत्सव को एक बहुआयामी और यादगार अनुभव बना दिया है।




