Fourth Eye News

एक्सक्लूसिव खबरों का अड्डा

बंदूक से बुलंद भविष्य तक: सुकमा में आत्मसमर्पित युवा बन रहे विकास के नए शिल्पकार

From guns to bright futures: Dedicated youth in Sukma are becoming the new architects of development.

रायपुर। कभी नक्सल हिंसा और भय की पहचान रहा सुकमा आज बदलाव, विश्वास और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बनकर उभर रहा है। जिन युवाओं ने कभी भटकाव और संघर्ष भरी जिंदगी देखी, वे अब समाज की मुख्यधारा में लौटकर विकास कार्यों के भागीदार बन रहे हैं। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति और जिला प्रशासन की पहल ने इन युवाओं के जीवन को नई दिशा दी है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में चलाए जा रहे पुनर्वास एवं कौशल विकास कार्यक्रम के तहत जिला प्रशासन सुकमा और एसबीआई आरसेटी के सहयोग से 25 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें 13 महिलाएं और 12 पुरुष शामिल हैं। यह प्रशिक्षण केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत का माध्यम बन रहा है।

प्रशिक्षण केंद्र में युवा आधुनिक निर्माण तकनीक, चिनाई, प्लास्टर, माप-जोख और भवन निर्माण की बारीकियां सीख रहे हैं। भविष्य में यही प्रशिक्षित युवा प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) सहित विभिन्न निर्माण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाएंगे। जिन हाथों ने कभी हिंसा का रास्ता अपनाया था, वे अब लोगों के सपनों का आशियाना तैयार करेंगे।

कोंटा क्षेत्र की सोड़ी हूंगी बताती हैं कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें सुरक्षा, सम्मान और सीखने का अवसर मिला। अब वे अपने पैरों पर खड़े होकर परिवार का सहारा बनने का सपना देख रही हैं। उनके लिए यह प्रशिक्षण रोजगार के साथ-साथ आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान का रास्ता भी है।

वहीं जगरगुंडा क्षेत्र के पदम रैनूरू का कहना है कि जंगलों की जिंदगी केवल अनिश्चितता और संघर्ष से भरी थी। अब उन्हें रहने की सुविधा, प्रशिक्षण और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिला है। उनका मानना है कि सरकार की पुनर्वास योजनाओं ने उन्हें भटकाव से निकालकर भविष्य की राह दिखाई है।

इस पहल का असर केवल युवाओं के जीवन तक सीमित नहीं है। सुकमा में लंबे समय से कुशल राजमिस्त्रियों की कमी महसूस की जा रही थी, जिससे विभिन्न निर्माण कार्य प्रभावित होते थे। अब प्रशिक्षित युवा स्थानीय स्तर पर रोजगार पाने के साथ-साथ जिले के विकास कार्यों को भी गति देंगे।

कलेक्टर अमित कुमार के अनुसार आत्मसमर्पण केवल हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और आत्मनिर्भर नागरिक बनने की प्रक्रिया है। इसी सोच के तहत अब तक लगभग 280 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिससे उन्हें स्थायी रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिल रहा है।

सुकमा की यह कहानी केवल पुनर्वास की सफलता नहीं, बल्कि बदलते बस्तर की नई पहचान है। यहां अब भय की जगह विश्वास, हिंसा की जगह विकास और संघर्ष की जगह आत्मनिर्भरता की बातें हो रही हैं। कभी जिन रास्तों पर डर का साया था, वहां आज उम्मीद और नए भविष्य के सपने आकार ले रहे हैं।