मक्का में रची गई ‘इस्लामिक नाटो’ की साजिश! पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी के नए ‘ट्रिपल अलायंस’ से दहला पश्चिम एशिया, क्या कागजी शेर साबित होगा यह गठबंधन?
पश्चिम एशिया और पूरे इस्लामी जगत में शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए एक बहुत बड़ी और रहस्यमयी गुटबाजी सामने आई है। पिछले 24 घंटों में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य और कूटनीतिक नेतृत्व ने मक्का में एक अत्यंत गोपनीय बैठक के बाद ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ (Mecca Joint Defence Agreement) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं [The Hindu: Pakistan, Saudi and Turkiye sign joint defence agreement]. इस नए गुट को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दिया जा रहा है।
इस पैक्ट के पीछे की मुख्य साजिश यह है कि तुर्की के खतरनाक ड्रोन और मिसाइल टेक्नोलॉजी, सऊदी अरब के असीमित पैसे और पाकिस्तान की परमाणु-संपन्न लेकिन जर्जर सेना को मिलाकर एक ऐसा सैन्य त्रिकोण बनाया जाए जो पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक राजनीति को ब्लैकमेल कर सके। इस समझौते की सबसे तीखी बात यह है कि इसमें एक ‘सामूहिक सुरक्षा क्लॉज’ शामिल है, जिसका मतलब है कि किसी भी एक देश पर हुआ हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
तुर्की खुद को उस्मानी साम्राज्य के रूप में स्थापित करना चाहता है
इस त्रिपक्षीय गठबंधन के उभरने से ईरान, इजराइल और पश्चिमी देशों के रणनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। दिवालियापन की कगार पर खड़ा पाकिस्तान इस समझौते को अपनी डूबती नौका के लिए एक तिनके का सहारा मान रहा है। वह उम्मीद कर रहा है कि सऊदी अरब के रियाल और तुर्की के ‘बायराक्तर’ ड्रोन के दम पर वह अपनी कमज़ोर सैन्य स्थिति को छिपा सकेगा। हालांकि, रक्षा विश्लेषक इस नए एलायंस को केवल एक ‘कागजी शेर’ (Paper Tiger) मान रहे हैं। इसका कारण यह है कि तीनों देशों के आंतरिक हित एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते।
तुर्की खुद को उस्मानी साम्राज्य के रूप में स्थापित करना चाहता है, जबकि सऊदी अरब इस्लामी दुनिया की कप्तानी किसी और को देने के मूड में नहीं है। संभावना यह है कि यह गुटबारी बहुत जल्द बिखर जाएगी, क्योंकि जैसे ही अमेरिका या इजराइल की तरफ से सऊदी अरब पर आर्थिक या रणनीतिक दबाव बढ़ेगा, रियाद खुद को इस समझौते से अलग कर लेगा। पाकिस्तान एक बार फिर इस त्रिकोणीय खेल में केवल एक भाड़े के सैनिक (Mercenary) से ज्यादा कुछ साबित नहीं होने वाला है।




