हॉर्मुज़ पर ईरान ने अमेरिका को फिर घेरा, अब खुलने की कीमत चुकानी होगी!

तेल की दुनिया की सबसे अहम नस पर उंगलियां रखकर ईरान ने अमेरिका को ऐसा संदेश दिया है जिसे नजरअंदाज करना पूरी दुनिया के लिए महंगा पड़ सकता है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ को फिर से खोलने की उम्मीदें बनी थीं, लेकिन तेहरान ने साफ कर दिया है कि सिर्फ बातचीत या नए शिपिंग रूट का समझौता काफी नहीं होगा।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मुताबिक ओमान के साथ हॉर्मुज़ में नए शिपिंग लेन को लेकर समझौता अंतिम चरण में है, लेकिन इससे जलडमरूमध्य अपने आप पूरी तरह नहीं खुलेगा। ईरान अमेरिका से कई शर्तों पर अमल चाहता है।
यही इस संकट का सबसे विस्फोटक हिस्सा है।
असली विवाद क्या है?
हॉर्मुज़ फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में है। ईरान के बंद करने के बाद यहां से तेल और LNG की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। Reuters के मुताबिक युद्ध से पहले दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और LNG शिपमेंट इस रास्ते से गुजरते थे।
ईरान का कहना है कि अमेरिका ने जून में हुए अंतरिम समझौते का उल्लंघन किया है। इसलिए तेहरान अब सिर्फ हॉर्मुज़ खोलने के बदले सामान्य आश्वासन स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
दूसरी तरफ अमेरिकी पक्ष इस रणनीतिक जलमार्ग में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बहाल करना चाहता है। लेकिन सैन्य दबाव और समुद्री नाकाबंदी ने बातचीत को और कठिन बना दिया है।
संकट के तीन बड़े मोर्चे
- हॉर्मुज़ में शिपिंग की अनिश्चितता
- अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे का संकट
- तेल की कीमतों पर लगातार दबाव
10 अगस्त को एशियाई बाजारों में तेल की कीमतों में तेजी दर्ज हुई। Brent करीब 84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा। बाजार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि हॉर्मुज़ का संकट लंबा चला तो महंगाई और ऊर्जा लागत दोनों बढ़ सकते हैं।
भारत के लिए खतरा कितना बड़ा?
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है। हॉर्मुज़ में लंबा व्यवधान भारतीय रिफाइनरियों की लागत, पेट्रोल-डीजल की कीमत और आयात बिल पर दबाव डाल सकता है। भारत ने पहले ही रणनीतिक तेल भंडारण बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
लेकिन असली खतरा केवल कच्चे तेल की कीमत नहीं है। समुद्री बीमा महंगा हुआ तो भारत आने वाले कार्गो की लागत भी बढ़ेगी।




