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विदेशी फंडिंग पर मोदी सरकार का बड़ा दांव, विपक्ष बोला- NGO पर बढ़ेगा सरकारी कब्जा!

विदेशी चंदे के नाम पर देश की सुरक्षा और पारदर्शिता का सवाल है या सरकार की निगरानी का दायरा खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है? FCRA Amendment Bill 2026 ने संसद के अंतिम दौर में यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है।

केंद्र सरकार का तर्क साफ है—विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सरकार के मुताबिक प्रस्तावित बदलाव FCRA व्यवस्था में मौजूद प्रशासनिक खामियों को दूर करने और विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन को स्पष्ट करने के लिए हैं।

लेकिन विपक्ष इसे सिर्फ प्रशासनिक सुधार मानने को तैयार नहीं है। कांग्रेस ने बिल का विरोध तेज कर दिया है और इसे NGO पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने वाला कदम बताया है।

असली राजनीतिक पेच क्या है?

बिल में एक Designated Authority का प्रावधान है। यदि किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संगठन उसे सरेंडर कर देता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और आगे की कार्रवाई के लिए यह व्यवस्था लागू होगी।

PRS के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक 14,449 FCRA प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि 22,498 रद्द और 15,212 समाप्त माने गए थे। यानी यह कानून हजारों संस्थाओं के लिए सीधे मायने रख सकता है।

सरकार के सामने सवाल:
• क्या कार्रवाई के लिए पर्याप्त स्वतंत्र सुरक्षा-कवच हैं?
• क्या प्रशासनिक गलती और गंभीर उल्लंघन के बीच पर्याप्त अंतर रखा गया है?
• संपत्ति विवाद में न्यायिक निगरानी कितनी मजबूत होगी?

विपक्ष के सामने भी सवाल:
• विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता की जरूरत से इनकार कैसे किया जा सकता है?
• यदि मौजूदा कानून में खामियां हैं तो उनका समाधान क्या है?

यही कारण है कि FCRA अब सिर्फ NGO का मुद्दा नहीं रहा। यह सरकारी शक्ति बनाम नागरिक संस्थाओं की स्वायत्तता की बहस बन चुका है।

सरकार यदि राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दे रही है तो उसे safeguards पर भी उतनी ही स्पष्टता दिखानी होगी। और विपक्ष यदि इसे सरकारी अतिक्रमण बता रहा है, तो उसे विदेशी फंडिंग में जवाबदेही का वैकल्पिक मॉडल भी सामने रखना होगा।

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