चरखे से अशोक चक्र तक: राष्ट्रगौरव ‘तिरंगे’ की विकास यात्रा और पिंगली वैंकया के अमूल्य योगदान की अमर कहानी!

(Fourth Eye News): जब-जब गगन में हमारा राष्ट्रध्वज ‘तिरंगा’ फहराता है, तब-तब हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और आंखों में देशभक्ति का स्वाभिमान चमकने लगता है। आन, बान और शान का प्रतीक यह तिरंगा केवल तीन रंगों का संगम नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के त्याग, बलिदान और सपनों की साक्षात मूर्ति है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे इस प्यारे तिरंगे का वर्तमान स्वरूप कैसे तैयार हुआ?
पिंगली वैंकया: वो निःस्वार्थ शिल्पकार जिसने देश को दी पहचान
आंध्र प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी और दूरदर्शी पिंगली वैंकया जी ने वर्षों के अध्ययन के बाद भारत के ध्वज का शुरुआती ढांचा तैयार किया था। 1931 में कांग्रेस के अधिवेशन में जिस ध्वज को स्वीकार किया गया था, उसमें केसरिया, सफेद और हरे रंग के साथ मध्य में सूत कातने वाला ‘चरखा’ अंकित था। यह चरखा स्वदेशी आंदोलन, आत्मनिर्भरता और महात्मा गांधी के विचारों का प्रतीक था।
22 जुलाई 1947: जब संविधान सभा ने चुना धर्मचक्र
आज़ादी से ठीक कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज को आधिकारिक रूप से अपनाया। इस ऐतिहासिक मोड़ पर चरखे की जगह सम्राट अशोक के सारनाथ स्तंभ से लिए गए ‘अशोक चक्र’ को ध्वज के केंद्र में स्थापित किया गया। 24 तीलियों वाला यह नीले रंग का चक्र हमें संदेश देता है कि राष्ट्र का विकास और धर्म (कर्तव्य) का पहिया कभी रुकना नहीं चाहिए। तिरंगे की यह विकास गाथा हमारे राष्ट्रीय गौरव का जीवंत दस्तावेज है।




