सहकारिता विभाग में सालों से जमे अफसर, फाइलों में दबी जनसुनवाई, आम जनता के साथ सीएम हेल्पलाइन भी बेबस ?

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विशेष पड़ताल | रायपुर

आम नागरिक और सहकारी संस्थाओं के हितों की रक्षा के लिए गठित सहकारिता विभाग आज खुद गंभीर प्रशासनिक सुस्ती और कार्यप्रणाली के सवालों के घेरे में है। विभाग में लंबे समय से एक ही कुर्सी और दफ्तर पर काबिज अधिकारियों के रसूख के चलते आम जनता के जरूरी काम अटके पड़े हैं। जनसुनवाई महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है और शिकायतों पर ठोस कार्रवाई के बजाय फाइलों को दबाने का खेल बदस्तूर जारी है।

सालों से एक ही दफ्तर में पदस्थापना: जवाबदेही शून्य, मनमानी चरम पर

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पूर्णिमा सिंह, डिप्टी डायरेक्टर, जिला सहकारिता विभाग रायपुर

प्रशासनिक नियमावली के तहत तय समयसीमा के बाद अधिकारियों के स्थानांतरण का प्रावधान इसलिए रखा जाता है ताकि पारदर्शिता बनी रहे और किसी तरह का गठजोड़ न पनपे। इसके विपरीत, सहकारिता विभाग के जिला व संभाग स्तरीय कार्यालयों में कई अधिकारी वर्षों से एक ही सीट पर डटे हुए हैं।

इस दीर्घकालिक पदस्थापना के गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं:

  • स्थानीय गठजोड़ का निर्माण: लंबे समय तक एक ही स्थान पर रहने से अधिकारियों और विवादित समितियों के पदाधिकारियों के बीच ऐसा तंत्र विकसित हो जाता है, जिससे निष्पक्ष जांच प्रभावित होती है।
  • जनसुनवाई से बेरुखी: जनसुनवाई में पहुंचने वाले फरियादियों की समस्याओं को संवेदनशीलता से सुलझाने के बजाय टालमटोल की नीति अपनाई जाती है। लोग हफ्तों-महीनों दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
  • पारदर्शिता का अभाव: निर्णय लेने की गति धीमी हो चुकी है और आम नागरिकों के आवेदन महीनों तक धूल फांकते रहते हैं।

सहकारिता विभाग में 12 से 20 सालों से अंगद की तरह जमे अफसर: सीएम हेल्पलाइन भी बेबस, फाइलों में दबी जनसुनवाई

विभाग में सालों से एक ही दफ्तर और संभाग में जमे अधिकारियों की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वे प्रशासनिक बदलावों और शासन के आदेशों से पूरी तरह बेपरवाह नजर आते हैं।

  • 20 साल तक एक ही दफ्तर: 12 से 20 साल का कार्यकाल किसी एक विभाग में बिताने के कारण अफसरों का ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है, जिसे भेद पाना आम नागरिक तो दूर, जांच एजेंसियों के लिए भी चुनौती बन गया है।
  • मोनोपॉली और मनमानी: वर्षों से जमे रहने के कारण कार्यशैली में जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो चुकी है। काम करने का तरीका जनहित के बजाय निजी प्राथमिकताओं और गठजोड़ के आधार पर तय होता है।
  • ट्रांसफर नियमों की अनदेखी: हर प्रशासनिक सत्र में स्थानांतरण सूचियां जारी होती हैं, लेकिन सहकारिता विभाग के इन रसूखदार अधिकारियों की कुर्सियां कभी नहीं हिलतीं।

सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर

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जनता की अंतिम उम्मीद कहे जाने वाले मंच ‘सीएम हेल्पलाइन’ की स्थिति भी सहकारिता विभाग के मामलों में निराशाजनक हो चुकी है:

भाग के सबसे संवेदनशील कार्यों में से एक आवासीय सहकारी समितियों (Housing Cooperative Societies) का सुचारू संचालन और उनकी निगरानी सुनिश्चित करना है। जमीनी हकीकत यह है कि कई गृह निर्माण और आवासीय समितियों में जमीन आवंटन, फर्जी सदस्यता और लाखों-करोड़ों के वित्तीय गबन की शिकायतें जांच के नाम पर लंबित पड़ी हैं।

आरोप हैं कि शिकायतों पर कड़ी कार्रवाई करने और ऑडिट में सामने आई गड़बड़ियों पर एफआईआर दर्ज कराने के बजाय जांच को अंतहीन तारीखों में उलझा दिया जाता है। इसका सीधा नुकसान उन मध्यमवर्गीय परिवारों को उठाना पड़ता है, जिनकी गाढ़ी कमाई इन सोसायटियों में फंसी हुई है।

सूचना का अधिकार (RTI): पारदर्शिता से बचने के लिए भ्रामक बहाने

शासन के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाला आरटीआई कानून सहकारिता विभाग की चौखट पर आकर बेअसर साबित हो रहा है।

  • तय समयसीमा का उल्लंघन: निर्धारित 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय आवेदनों को जानबूझकर महीनों लटकाया जाता है।
  • गोलमोल और भ्रामक जवाब: वित्तीय अनियमितताओं या पदस्थापना से जुड़ी अहम जानकारियां मांगने पर जानकारी उपलब्ध न होने, मामला विचाराधीन होने अथवा बेतुके नियमों का हवाला देकर आवेदन खारिज कर दिए जाते हैं।
  • अपीलों का अंबार: प्रथम अपीलीय स्तर पर भी नागरिकों को न्याय नहीं मिलता, जिससे उन्हें राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

जनहित में व्यापक प्रशासनिक सर्जरी और जांच की दरकार

सहकारिता आंदोलन का मूल सिद्धांत ‘सबके कल्याण’ पर आधारित है, लेकिन वर्तमान प्रशासनिक तंत्र में यह तंत्र जनता की परेशानी का सबब बन चुका है। विभाग की साख बहाल करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने जरूरी हैं:

गबन के मामलों में उच्चस्तरीय जांच: आवासीय और साख समितियों में वित्तीय अनियमितताओं के मामलों की स्वतंत्र एजेंसी या संभागीय स्तर के उच्चाधिकारियों से समयबद्ध जांच कराई जाए।

अनिवार्य स्थानांतरण नीति: वर्षों से एक ही संभाग या जिले में अंगद की तरह पैर जमाए बैठे अधिकारियों की तत्काल समीक्षा कर उनका तबादला किया जाए।

लंबित जनसुनवाई और शिकायतों की समयबद्ध समीक्षा: जनसुनवाई में दर्ज सभी शिकायतों का डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम बने और तय समय में निराकरण न होने पर जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हो।

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