राज्योत्सव में बिखरे भारतीय हथकरघा के रंग, देशभर की खूबसूरत साड़ियों ने मोहा लोगों का मन

The colors of Indian handlooms spread throughout the state festival; beautiful saris from across the country captivated the people.
आर्टिकल अच्छा लगे तो शेयर करें

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 में भारतीय हथकरघा की समृद्ध परंपरा और कारीगरों की अद्भुत कलाकारी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। नवा रायपुर स्थित राज्योत्सव मैदान में देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे बुनकर अपने हाथों से तैयार किए गए खूबसूरत वस्त्रों का प्रदर्शन और बिक्री कर रहे हैं। इन वस्त्रों की आकर्षक डिजाइन, बेहतरीन रंग संयोजन और शानदार गुणवत्ता लोगों को खूब पसंद आ रही है।

राज्योत्सव में लगाए गए हथकरघा स्टॉल पर भारतीय पारंपरिक वस्त्रों की विविधता देखने को मिल रही है। यहां मध्यप्रदेश की माहेश्वरी और चंदेरी साड़ियों से लेकर असम की मूगा सिल्क, मूगा कॉटन, बिहार की मधुबनी प्रिंट, पश्चिम बंगाल की काथा वर्क और बनारसी साड़ियों तक की शानदार रेंज उपलब्ध है। इसके अलावा पोचमपल्ली, कोसा, भागलपुरी, जामदानी, बटिक सिल्क, लिनन कॉटन, मसलिन प्योर कॉटन और बैम्बू सिल्क की साड़ियां भी लोगों को आकर्षित कर रही हैं। साड़ियों के साथ दुपट्टे, स्कार्फ और अन्य फैब्रिक्स भी किफायती कीमतों पर खरीदे जा सकते हैं।

ये खबर भी पढ़े —: पांच हेलीकॉप्टर, खतरनाक क्रॉसओवर और तिरंगे की फॉर्मेशन, ऐसा रहा नवा रायपुर का भव्य एयर-शो!

मध्यप्रदेश के खंडवा से पहुंचे तेज बहादुर सिंह ने बताया कि वे हर साल राज्योत्सव में अपने उत्पाद लेकर आते हैं। छत्तीसगढ़ में उन्हें अच्छा प्रतिसाद मिलता है। उनके स्टॉल पर माहेश्वरी, चंदेरी और मधुबनी प्रिंट की साड़ियों का विशेष संग्रह उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि हथकरघा कला को आगे बढ़ाने के लिए वे लगातार नई तकनीक और डिजाइन सीख रहे हैं। इसके लिए उन्होंने पांडिचेरी में मार्बल प्रिंट और नेपाल में मधुबनी प्रिंट का प्रशिक्षण भी लिया है।

इसी तरह पश्चिम बंगाल के वर्धमान से आए हसीबुल के स्टॉल पर काथा वर्क, मूगा सिल्क, मूगा कॉटन और लिनन कॉटन की साड़ियां उपलब्ध हैं। बिहार के मिथलेश कुमार मधुबनी प्रिंट, केला रेशम, कॉटन सिल्क, वर्ली प्रिंट और बैम्बू सिल्क की साड़ियां लेकर पहुंचे हैं। वहीं कोलकाता से आए शादिर अंसारी के स्टॉल पर काथा वर्क, जामदानी, पेंच वर्क और असम सिल्क की आकर्षक साड़ियां लोगों को पसंद आ रही हैं।

हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण की कला नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और हजारों कारीगरों की आजीविका का आधार भी है। राज्योत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से बुनकरों को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री के लिए बड़ा बाजार मिल रहा है। शासन की ओर से पारंपरिक बुनकारी को संरक्षित करने और कारीगरों को प्रोत्साहित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *