भारत-ईयू फ्री ट्रेड डील: महंगी दवाओं पर घट सकता है बोझ, लेकिन सस्ती होने की गारंटी नहीं

भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हुए ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से हेल्थकेयर सेक्टर में बड़े बदलाव की उम्मीद जगी है। इस समझौते के तहत दवाओं, मेडिकल डिवाइस और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स पर लगने वाले इंपोर्ट टैरिफ को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। इसका सीधा फायदा उन दवाओं को मिल सकता है जो अभी तक ऊंची इंपोर्ट ड्यूटी के कारण महंगी थीं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, हालांकि टैरिफ कम होने से इंपोर्टेड दवाओं की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, लेकिन मरीजों तक कीमतों का फायदा पहुंचना पेटेंट नियमों, रेगुलेशन और सप्लाई चेन पर निर्भर करेगा। सिर्फ ड्यूटी कम होना अपने आप में दाम घटने की गारंटी नहीं है।
भारत-ईयू ट्रेड रिश्तों में फार्मास्युटिकल सेक्टर की अहम भूमिका है। भारत जहां जेनेरिक दवाओं और वैक्सीन का बड़ा वैश्विक सप्लायर है, वहीं यूरोप इनोवेटिव और हाई-वैल्यू दवाएं बनाने वाली बड़ी कंपनियों का केंद्र है। इस नई डील से दोनों पक्षों के बीच ट्रेड, इन्वेस्टमेंट और टेक्नोलॉजी सहयोग को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस FTA से यूरोपियन यूनियन के करीब 4 बिलियन यूरो तक के एक्सपोर्ट पर लगने वाले टैरिफ खत्म हो सकते हैं। इससे कैंसर, हार्मोन, बायोलॉजिक्स और अन्य एडवांस्ड थेरेपी जैसी इंपोर्टेड दवाएं पहले की तुलना में सस्ती पड़ सकती हैं, जिससे अस्पतालों और डिस्ट्रीब्यूटर्स की लागत घटेगी।
वजन घटाने वाली नई पीढ़ी की दवाओं को लेकर भी चर्चा तेज है। ओजेम्पिक, मौनजारो और वेगोवी जैसी दवाएं अभी पेटेंट सुरक्षा में हैं और भारत में इनकी कीमतें बाजार तय करता है। ऐसे में इन दवाओं के दामों में बड़ी गिरावट पेटेंट खत्म होने और घरेलू जेनेरिक या बायोसिमिलर आने पर ही संभव मानी जा रही है।
जीवन रक्षक दवाओं के मामले में यह डील ज्यादा असर दिखा सकती है। खासतौर पर कैंसर, हृदय रोग, हार्मोनल बीमारियों और दुर्लभ रोगों में इस्तेमाल होने वाली यूरोप में बनी एडवांस्ड दवाओं की कीमतें टैरिफ घटने से कुछ हद तक कम हो सकती हैं। कुल मिलाकर, यह डील भारत में हेल्थकेयर की पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है, लेकिन असली राहत कब और कितनी मिलेगी, यह आने वाले समय में साफ होगा।



