गुनाचुनावी चौपालमध्यप्रदेश

सांसद केपी यादव ने भाजपा में आकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया, लेकिन अब उसी भाजपा में उन्ही से हारते दिख रहे हैं

मध्यप्रदेश की गुना लोकसभा एक ऐसी सीट रही है, जिस पर केपी यादव का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है. लेकिन इसे बुरी किस्मत कहिये, या समय चक्र, कि जिसके खिलाफ चुनाव लड़कर केपी यादव ने अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया था. आज उसी नेता को, केपी यादव की पार्टी में ही बड़ा रुतबा हासिल हो गया है.

हम बात कर रहे हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया की. जिन्हें गुना लोकसभा सीट पर ऐसी हार मिली, कि वे इस हार को भुलाये नहीं भूल सकते है. आज हम सिंधिया की इसी हार, और केपी यादव की जीत के बाद भी उनके अंदर छिपे दर्द के बारे में बताने जा रहे हैं.

दरअसल पिछले यानि 2019 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा ने गुना लोकसभा सीट से एक अंजान से चेहरे को टिकट दिया. जिसका नाम था कृष्णपाल उर्फ केपी यादव. केपी यादव ने इस सीट पर वो कमाल कर दिया, जिसका इंतजार भाजपा सालों से कर रही थी.

केपी यादव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया को सवा लाख वोटों से पराजित कर अपना इतिहास में नाम दर्ज करा दिया. क्योंकि इस सीट पर सिंधिया राजघराने की तीन पीढ़ियों का कब्जा रहा और यह परिवार कोई चुनाव नहीं हारा था. अब यहां सबसे बड़ी खास बात ये है, कि केपी एक समय सिंधिया के ही खास सिपहसालार माने जाते थे.   और उन्हीं के साथ रहते हुए केपी यादव ने भी नेतागिरी सिखी थी.

केपी यादव के पिता रघुवीर सिंह यादव चार बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके थे. पेशे से डॉक्टर केपी ने 2004 में राजनीति में एंट्री ली और वह जिला पंचायत सदस्य चुने गए. राजनीति के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में रुचि लेने वाले यादव धीरे-धीरे सिंधिया की पसंद बन गए और जल्द ही वे सांसद प्रतिनिध की भूमिका निभाने लगे.

विधानसभा टिकट पर मनमुटाव
बताया जाता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के नजदीकी रहे केपी यादव अशोकनगर जिले की मुंगावली विधानसभा सीट से 2018 के विधानसभा चुनावों में अपने लिए कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे. सिंधिया ने भी केपी के लिए हामी भर दी थी और उनसे क्षेत्र में प्रचार करने को कह दिया गया था, लेकिन ऐन मौके पर उनका टिकट काट दिया गया. और इसी  के बाद केपी यादव ने बगावत बिगुल फूंक दिया. इसके बाद केपी यादव ने बीजेपी का दामन थाम लिया.

हालांकि, विधानसभा चुनावों में उनको कांग्रेस के बृजेंद्र सिंह यादव से करीबी हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन भाजपा ने उनपर एक बार फिर भरोसा दिखाया. और उन्हें लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ मैदान में उतार दिया. उस वक्त किसी को यकीन नहीं था, कि गुना से महाराजा यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया जा सकता है. 

सिंधिया को हराने की उम्मीद कोई इसलिये भी नहीं कर रहा था, क्योंकि सिंधिया राजघराने के परिवार की तीन पीढ़ियों को गुना लोकसभा सीट से जीत मिलती रही थी. 14 बार सांसद के तौर जनता ने चुनकर भेजा है. सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजयाराजे सिंधिया 6 बार गुना से सांसद रहीं, तो उनके पिता माधवराव 4 बार चुने गए थे।

ज्योतिरादित्य ने भी चार बार इस क्षेत्र का संसद में प्रतिनिधित्व किया. बीजेपी ने इससे पहले भाजपा के दिग्गज नेता माने जाने वाले जयभान सिंह पवैया, नरोत्तम मिश्रा को भी ज्योतिरादित्य के खिलाफ मैदान में उतारा था, लेकिन वे भी सिंधिया के इस किले को नहीं भेद पाए.

केपी यादव ने ज्यातिरादित्य सिंधिया को हराकर पूरे देश में सुर्खियां तो पा लीं, लेकिन उनकी ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. क्योंकि जिस भाजपा में शामिल होकर उन्होने कांग्रेस के इस दिग्गज नेता को हराया था. वो खुद ही भाजपा में शामिल हो गए हैं. और भाजपा में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के रुतबे के आगे केपी यादव बोने से दिखाई देने लगे हैं.

चूंकि गुना लोकसभा सिंधिया परिवार के बेहद करीब रही है, लिहाजा ज्योतिरादित्य सिंधिया भी यहां खासा दखल रखते हैं. और लाख कोशिशें करने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया और केपी यादव दोनों, चुनाव के वक्त हुए मन मुटाव को दूर नहीं कर पा रहे हैं. यही वजह है कि केपी यादव ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ पार्टी के अध्यक्ष तक को पत्र लिख चुके हैं.

लेकिन शायद यहां भी उनकी नहीं चलने वाली है. आप ही बताइए कि क्या केपी यादव के साथ गलत हो रहा है, या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद वाकई काफी बड़ा है, जिसकी वजह से केपी यादव को जबज्जो नहीं मिल रही है.

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