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रायपुर साहित्य उत्सव में नाट्यशास्त्र पर मंथन, भारतीय कला परंपरा की वैश्विक पहचान पर जोर

रायपुर साहित्य उत्सव के तहत श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में रविवार को “नाट्यशास्त्र और कला परंपरा” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई। यह सत्र भारतीय कला के महान संरक्षक राजा चक्रधर सिंह को समर्पित रहा। कार्यक्रम का संचालन राजेश गानोदवाले ने किया।

सत्र में इंदिरा कला विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की कुलपति डॉ. लवली शर्मा और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से जुड़े डॉ. सच्चिदानंद जोशी बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने नाट्यशास्त्र को भारतीय सृजनात्मक चेतना की आधारशिला बताते हुए कहा कि जहां भी कला और अभिव्यक्ति है, वहां नाट्यशास्त्र की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने पारंपरिक वाद्य निर्माण की परंपरा पर बने तानपुरा संबंधी वृत्तचित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास लुप्त होती कलाओं के दस्तावेजीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में नाट्यशास्त्र और भगवद्गीता की पांडुलिपियों के शामिल होने को भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए गौरव का विषय बताया। साथ ही गुरु–शिष्य परंपरा को भाव, संस्कार और समर्पण से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि इसे मजबूत करने के लिए विशेष दीक्षा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

डॉ. लवली शर्मा ने विश्वविद्यालय द्वारा दुर्लभ वाद्य यंत्रों के संरक्षण, परिसर स्थित ऐतिहासिक बावड़ी के जीर्णोद्धार और वाद्य अनुरक्षण से जुड़े पाठ्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शिल्पकारों को सम्मानित करने की परंपरा के जरिए पारंपरिक वाद्य संस्कृति को जीवंत रखा जा रहा है।

परिचर्चा में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि नाट्यशास्त्र और भारतीय कला परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, जिनके संरक्षण में समाज और शैक्षणिक संस्थानों की साझा भूमिका आवश्यक है।

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