वेनेजुएला के बाद किस पर अमेरिका की नजर? ट्रंप की आक्रामक नीति से दुनिया में बढ़ी बेचैनी

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के जरिए गिरफ्तारी के बाद वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस कदम ने न सिर्फ लैटिन अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अमेरिका का अगला निशाना कौन हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में उठाया गया यह फैसला केवल एक देश तक सीमित कार्रवाई नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे अमेरिका की बदली हुई और ज्यादा आक्रामक विदेश नीति का संकेत बताया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वेनेजुएला में की गई कार्रवाई को कई विशेषज्ञ “अवैध तख्तापलट” की श्रेणी में रख रहे हैं। उनका कहना है कि यह कदम न तो किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत उठाया गया और न ही स्थानीय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया। इसे ड्रग तस्करी या अवैध प्रवास रोकने की आड़ में किया गया सीधा सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि वेनेजुएला के बाद ईरान अमेरिका के संभावित टार्गेट में सबसे ऊपर है। ईरान में जारी प्रदर्शनों को अमेरिकी समर्थन मिलने की खबरों ने इस आशंका को और मजबूत किया है कि अगर अमेरिका को अपने रणनीतिक या ऊर्जा हितों पर खतरा महसूस हुआ, तो वह मध्य-पूर्व में भी हस्तक्षेप कर सकता है।
क्यूबा भी लंबे समय से अमेरिकी नीति का संवेदनशील बिंदु रहा है। ट्रंप पहले ही क्यूबा को कड़ी चेतावनी दे चुके हैं। वेनेजुएला को क्यूबा के समर्थन के चलते अब उस पर भी दबाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। क्यूबा का कहना है कि अमेरिका की यह नीति किसी एक सरकार को हटाने से ज्यादा, अपने प्रभाव को थोपने की कोशिश है।
दक्षिण अमेरिका में कोलंबिया ने भी अमेरिकी कार्रवाई पर चिंता जताई है। कोलंबिया समेत कई देशों का मानना है कि इस तरह का सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ट्रंप की ओर से कोलंबिया के राष्ट्रपति पर की गई टिप्पणी ने तनाव को और बढ़ा दिया है।
यूरोप में भी बेचैनी कम नहीं है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुख ने नाटो सहयोगियों को असहज कर दिया है। डेनमार्क की खुफिया एजेंसी ने अमेरिका को संभावित खतरे के रूप में देखते हुए चेताया है कि अब वॉशिंगटन आर्थिक और तकनीकी ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के ट्रंप के बयानों ने कूटनीतिक तनाव को और गहरा कर दिया है।
डेनमार्क नाटो का संस्थापक सदस्य रहा है, बावजूद इसके उसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि नाटो की सामूहिक सुरक्षा की गारंटी भी भविष्य में सवालों के घेरे में आ सकती है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की नीति अब साफ तौर पर यह संकेत दे रही है कि वह न केवल विरोधियों, बल्कि अपने पुराने सहयोगियों पर भी दबाव बनाने से पीछे नहीं हटेगा।
कुल मिलाकर, अमेरिका की यह बदली हुई रणनीति वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता और असुरक्षा को बढ़ा रही है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि अगला टार्गेट कौन होगा, बल्कि यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांत इस नए दौर में कितने सुरक्षित रह पाएंगे।


