बस्तर की माटी, कला और स्वाद से रूबरू हुईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

रायपुर। बस्तर पंडुम के शुभारंभ अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जनजातीय विरासत से सजी भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने बस्तर की मिट्टी की खुशबू, आदिवासी परंपराओं और लोक जीवन की झलक को करीब से महसूस किया। राष्ट्रपति ने विभिन्न स्टॉलों पर पहुंचकर स्थानीय कारीगरों और कलाकारों से संवाद किया और उनकी कला व उत्पादों की जानकारी ली।
राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम को आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और उसे वैश्विक पहचान दिलाने वाला सशक्त मंच बताया। उन्होंने ढोकरा हस्तशिल्प, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बांस शिल्प, लौह कला, जनजातीय वेशभूषा व आभूषण, तुम्बा कला, पारंपरिक चित्रकला और स्थानीय व्यंजनों पर आधारित प्रदर्शनी की सराहना की।
हस्तशिल्प प्रदर्शनी में ढोकरा कला के विशेष स्टॉल ने सभी का ध्यान खींचा। लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक से तैयार यह प्राचीन धातु कला प्रकृति, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन को जीवंत रूप में दर्शाती है। टेराकोटा कला के तहत मिट्टी से बनी आकृतियों ने लोक आस्था और पारंपरिक विश्वासों को साकार किया।
लकड़ी की नक्काशी में सागौन, बीजा, सिवनर और साल लकड़ी से निर्मित कलाकृतियां प्रदर्शित की गईं, जिनमें पारंपरिक औजारों से बारीक कारीगरी देखने को मिली। वहीं सीसल और बांस कला से बने उपयोगी व सजावटी उत्पादों के साथ गढ़ा हुआ लोहे से बनी कलाकृतियों ने भी राष्ट्रपति को प्रभावित किया।
जनजातीय आभूषणों के स्टॉल में चांदी, मोती, शंख और विभिन्न धातुओं से बने हस्तनिर्मित आभूषण प्रदर्शित किए गए, जो आदिवासी समाज की पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। तुम्बा कला के अंतर्गत सूखी लौकी से बने पारंपरिक वाद्य यंत्र और सजावटी वस्तुएं भी आकर्षण का केंद्र रहीं।
प्रदर्शनी में दंडामी माढ़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा और हल्बा जनजातियों की पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों का सजीव प्रदर्शन किया गया। साथ ही जनजातीय चित्रकला के माध्यम से जंगल, पर्व-त्योहार, लोक देवता और दैनिक जीवन की रंगीन झलक प्रस्तुत की गई।
स्थानीय व्यंजन स्टॉल में जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया पेज, आमट, चापड़ा चटनी, भेंडा चटनी, कुलथी दाल, पान बोबो, तीखुर जैसे पारंपरिक व्यंजन और लांदा व सल्फी जैसे पेय प्रदर्शित किए गए। लोक चित्रों की प्रदर्शनी में बस्तर की संस्कृति, इतिहास और जनजातीय समाज से जुड़ा साहित्य भी शामिल रहा।



