जहां अमेरिका ने घुटने टेक दिए, वहां चारों तरफ से दुश्मनों से घिरे होने के बाद भी कैसे अजेय बना है इजराइल ?

एक ऐसा देश जिसका कुल क्षेत्रफल भारत के एक छोटे से राज्य मणिपुर या केरल से भी कम है. एक ऐसा देश जिसकी आबादी दिल्ली की जनसंख्या की आधी भी नहीं है. लेकिन वह देश पिछले कई महीनों से एक साथ सात मोर्चों पर अपनी संप्रभुता और अस्तित्व की सबसे लंबी और भीषण जंग लड़ रहा है. हम बात कर रहे हैं इजराइल की.
हमास के बर्बर आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ यह युद्ध अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है. सवाल यह उठता है कि चारों तरफ से हिंसक दुश्मनों, रॉकेटों और मिसाइलों से घिरे होने के बावजूद, यह छोटा सा देश कैसे न सिर्फ टिका हुआ है, बल्कि दुश्मनों के गढ़ में घुसकर उन्हें नेस्तनाबूद कर रहा है? जवाब छिपा है—इजराइल की अनोखी भौगोलिक परिस्थितियों, अत्याधुनिक तकनीक और वहां के नागरिकों के फौलादी जज्बे में.
भौगोलिक चुनौतियाँ: ‘डेथ ट्रैप’ के बीच बसा एक छोटा सा मुल्क
इजराइल की भौगोलिक स्थिति कूटनीतिक और सैन्य दृष्टि से किसी बुरे सपने जैसी है. यदि आप इजराइल के नक्शे को देखें, तो रणनीतिक रूप से वह बेहद संवेदनशील और कमजोर स्थिति में नजर आता है: [1]
- चारों तरफ से घेराबंदी: इजराइल के उत्तर में लेबनान (हिजबुल्लाह का गढ़) और सीरिया है. पूर्व में जॉर्डन और वेस्ट बैंक है, दक्षिण-पश्चिम में गाजा पट्टी (हमास) और मिस्र है, जबकि कुछ ही दूरी पर लाल सागर के पार यमन (हुती विद्रोही) और इन सबका आका ईरान बैठा है.
- भौगोलिक गहराई (Strategic Depth) की कमी: इजराइल की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी चौड़ाई का बेहद कम होना है. कुछ जगहों पर इजराइल की चौड़ाई (भूमध्य सागर से वेस्ट बैंक की सीमा तक) महज 15 से 20 किलोमीटर ही है. यानी अगर कोई दुश्मन देश तेज हमला करे, तो वह कुछ ही मिनटों में देश को दो हिस्सों में काट सकता है.
- आबादी का संकेंद्रण: इजराइल की अधिकांश आबादी और आर्थिक रीढ़ (तेल अवीव और तटीय मैदानी इलाके) एक छोटे से पट्टीनुमा क्षेत्र में बसी है, जो दुश्मनों के रॉकेटों की आसान जद में रहती है.
अभेद्य दीवार: तकनीक और सैन्य रणनीति का त्रिकोण
भौगोलिक कमियों को इजराइल ने अपनी सैन्य सूझबूझ और अत्याधुनिक तकनीक से पाट दिया है. इजराइल रक्षा बलों (IDF) ने देश को तीन सुरक्षा चक्रों में बांध रखा है:
- आयरन डोम और एरो सिस्टम (Iron Dome & Arrow System): गाजा या लेबनान से आने वाले 90% से अधिक शॉर्ट-रेंज रॉकेटों को आयरन डोम हवा में ही तबाह कर देता है. वहीं, यमन और ईरान से आने वाली लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को अंतरिक्ष की दहलीज पर रोकने के लिए ‘एरो-3’ जैसी प्रणालियां तैनात हैं.
- खुफिया तंत्र (Mossad और Shin Bet): इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसी मानी जाती है. पेजर धमाकों से लेकर दुश्मनों के शीर्ष कमांडरों को उनके भूमिगत बंकरों में खोजने तक, इजराइल का इंटेलिजेंस नेटवर्क उसकी रक्षा की पहली कतार है.
- अनिवार्य सैन्य सेवा (Conscription): इजराइल में हर नागरिक (पुरुषों के लिए करीब 3 साल और महिलाओं के लिए 2 साल) के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य है. यही कारण है कि संकट के समय देश का हर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या किसान तुरंत वर्दी पहनकर बंदूक थाम लेता है.
फौलादी जज्बा: ‘एक भी नागरिक पीछे नहीं छूटेगा’
इजराइल की असली ताकत उसके हथियार नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का राष्ट्रवाद और कभी न टूटने वाला जज्बा है, जिसे ‘इन्शाल्लाह’ या ‘यहूदी संकल्प’ कहा जाता है:
- रिजर्विस्ट्स का अभूतपूर्व समर्पण: जब युद्ध शुरू हुआ, तो दुनिया भर में रह रहे इजराइली नागरिक अपनी छुट्टियां, नौकरियां और व्यापार छोड़कर पहली उपलब्ध फ्लाइट से तेल अवीव पहुंचे ताकि अपनी मातृभूमि के लिए लड़ सकें. इजराइल ने कुछ ही दिनों में 3 लाख से अधिक रिजर्व सैनिकों को मोर्चे पर तैनात कर दिया.
- एकजुट समाज: राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर पूरा इजराइली समाज एक साथ खड़ा हो गया. सीमाओं पर लड़ रहे सैनिकों के लिए आम नागरिक खाना बना रहे हैं, खेतों में फसलें काट रहे हैं और अस्पतालों में स्वेच्छा से रक्तदान कर रहे हैं.
- अस्तित्व की लड़ाई: इजराइल के लोग जानते हैं कि उनके पास पीछे हटने के लिए कोई दूसरा देश नहीं है. उनके लिए यह युद्ध किसी क्षेत्र को जीतने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को जिंदा रखने के लिए है.
📈 तथ्यों और आंकड़ों में इजराइल की ताकत
| पैमाना [1] | विवरण / आंकड़े |
|---|---|
| कुल आबादी | लगभग 9.8 मिलियन (98 लाख) |
| सक्रिय सैनिक + रिजर्व | ~170,000 सक्रिय + 465,000 रिजर्व बल |
| सैन्य बजट | जीडीपी का लगभग 4.5% से 5% (दुनिया में सबसे अधिक अनुपातों में से एक) |
| तकनीकी बढ़त | दुनिया का एकमात्र देश जिसके पास बहुस्तरीय (Multi-layered) सक्रिय वायु रक्षा प्रणाली है. |
इतिहास से सीखा सबक
इजराइल का इतिहास गवाह है कि उसने 1948 का स्वतंत्रता युद्ध, 1967 का छह दिवसीय युद्ध (Six-Day War) और 1973 का योम किप्पुर युद्ध जैसी भयानक विभीषिकाओं को झेला है, जहाँ हर बार दुश्मनों का मकसद इजराइल को नक्शे से मिटाना था. लेकिन हर बार यह देश राख से उठकर और मजबूत होकर उभरा.
मौजूदा लंबी जंग भी इसी बात का प्रमाण है कि भूगोल भले ही इजराइल के खिलाफ हो, पड़ोसी भले ही क्रूर और हिंसक हों, लेकिन जब तक इजराइल के नागरिकों में अपनी मातृभूमि के लिए मर-मिटने का जज्बा और तकनीक का बेजोड़ तालमेल रहेगा, तब तक इस मुल्क को हरा पाना नामुमकिन है.




