देश की राजधानी की जेलें अब सुधार गृह कम और अपराध की यूनिवर्सिटी ज्यादा बन चुकी हैं!
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दिल्ली सरकार ने अब जाकर यह स्वीकार किया है कि राज्य की जेलों में बंद कुख्यात गैंगस्टर सलाखों के पीछे बैठकर भी रंगदारी के साम्राज्य चला रहे हैं, टार्गेटेड किलिंग की साजिशें रच रहे हैं और जेल के अंदर मिलने वाली सुविधाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं। अब सरकार इन hardened criminals को दूसरे राज्यों की जेलों में ट्रांसफर करने की योजना बना रही है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की यह लाचारी इस बात का सबूत नहीं है कि हमारी जेल प्रणालियां अंदर से पूरी तरह सड़ चुकी हैं?
जब एक अपराधी जेल के भीतर बैठकर मोबाइल फोन के जरिए बाहर फिरौती की पर्चियां कटवाता है और हत्याओं के सौदा तय करता है, तो इसका मतलब साफ है कि जेल के संतरी से लेकर मंत्री तक की मिलीभगत बिना यह खेल मुमकिन ही नहीं है। क्या सिर्फ कैदियों को दूसरे राज्य में भेज देने से अपराध की जड़ें खत्म हो जाएंगी? यह तो महज बीमारी के लक्षण छिपाने जैसा है, असली इलाज तो उस तंत्र को ध्वस्त करना है जो इन अपराधियों को जेल के भीतर वीआईपी सुविधाएं मुहैया कराता है।
आम जनता की सुरक्षा दांव पर लगी है और प्रशासन कागजी प्रस्ताव तैयार करने में व्यस्त है। आखिर कब तक जनता अपराधियों के खौफ के साये में जीने को मजबूर रहेगी? Fourth Eye News पूछता है—जब तक जेल के भीतर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों पर कठोर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक क्या इस तांडव पर कभी रोक लग पाएगी?
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