लाचार टीम इंडिया और नाकाम चयनकर्ता: जसप्रीत बुमराह के बिना श्रीलंका दौरे पर कटने वाली है नाक, हार के घावों पर नमक छिड़क रहा बीसीसीआई का अहंकार!

भारतीय क्रिकेट टीम का हाल इस वक्त एक ढहती हुई हवेली जैसा हो चुका है। विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) की अंक तालिका में दक्षिण अफ्रीका के हाथों 2-0 से शर्मनाक हार का मुंह देखने के बाद अब भारतीय टीम 48.15% अंक प्रतिशत (PCT) के साथ पांचवें पायदान पर रसातल में गिर चुकी है। लेकिन बीसीसीआई (BCCI) और चयन समिति की नींद अब भी नहीं खुल रही है। 3 अगस्त 2026 को जारी आधिकारिक रिपोर्ट ने देश के करोड़ों फैंस के दिल पर करारा प्रहार किया है—टीम के मुख्य तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह बाएं घुटने की गंभीर चोट के कारण श्रीलंका के खिलाफ आगामी दो मैचों की टेस्ट सीरीज से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं।
आखिर बुमराह के वर्कलोड मैनेजमेंट के नाम पर बीसीसीआई के मेडिकल रूम में चल क्या रहा है? जब खिलाड़ी इंग्लैंड सीरीज के दौरान ही चोट से जूझ रहा था, तो उसे आधे-अधूरे इलाज के साथ बिना सोचे-समझे मैदान पर ढकेलने की क्या तुक थी? दो साल के लंबे अंतराल के बाद वनडे में वापसी कराने और फिर दोबारा चोटिल होने के इस लापरवाही भरे ड्रामे का खामियाजा अब पूरा देश भुगत रहा है। बुमराह के अलावा हर्षात राणा (हैमस्ट्रिंग), नितीश कुमार रेड्डी (क्वाड) और वॉशिंगटन सुंदर (हैमस्ट्रिंग) पहले ही चोट की बलि चढ़ चुके हैं, जबकि साई सुदर्शन का खेलना भी अधर में लटका है।
इस भयानक संकट के दौर में चयनकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर के अनकैप्ड तेज गेंदबाज आकिब नबी को बुमराह के विकल्प के तौर पर टीम में शामिल किया है। माना कि आकिब का घरेलू सत्र में 60 विकेटों का प्रदर्शन काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट के भारी दबाव और श्रीलंका की घुमावदार पिचों पर वह बुमराह की भरपाई कर पाएंगे? यह सिर्फ एक खिलाड़ी की चोट का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के खोखले मैनेजमेंट और अति-आत्मविश्वास की तीखी पोल खोलता है। डब्ल्यूटीसी फाइनल की रेस से लगभग बाहर होने की कगार पर खड़ी भारतीय टीम अब 15 अगस्त से गॉल में श्रीलंका के खिलाफ उतरेगी। कप्तान शुभमन गिल और चयनकर्ताओं के पास इस बदहाली का कोई ठोस जवाब नहीं है। अगर श्रीलंका ने अपनी सरजमीं पर भारत को धो डाला, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उस लचर चयन प्रणाली पर होगी जो खिलाड़ियों की फिटनेस से खिलवाड़ कर रही है। देश की साख दांव पर है, लेकिन बीसीसीआई पैसों और विज्ञापनों का ढोल पीटने में व्यस्त है।



