नक्सलगढ़ से विकासगढ़ बना बीजापुर: अब गांव-गांव में रोजगार, पानी और पक्के घर की रौशनी

रायपुर। कभी नक्सल प्रभाव के कारण विकास से कोसों दूर रहे बीजापुर के अंदरूनी गांव अब नई पहचान बना रहे हैं। हालात ऐसे बदल रहे हैं कि जहां पहले डर और खालीपन था, वहां अब रोजगार, निर्माण और उम्मीद की आवाज सुनाई दे रही है।
नियद नेल्लानार योजना और मनरेगा के संयुक्त प्रयासों ने 42 सुरक्षा कैंपों के जरिए 67 ग्राम पंचायतों के 224 गांवों तक विकास की पहुंच सुनिश्चित की है। इन पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में अब सड़क, पानी, रोजगार और आवास जैसी मूलभूत सुविधाएं तेजी से आकार ले रही हैं।
गांवों में अब सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि उनका असर दिख रहा है। 16 हजार से ज्यादा परिवारों को काम मिला है, जिनमें बड़ी संख्या में नए जॉब कार्डधारी शामिल हैं। खास बात यह है कि आत्मसमर्पित नक्सलियों, पीड़ित और प्रभावित परिवारों को भी मुख्यधारा से जोड़ते हुए रोजगार दिया जा रहा है।
मनरेगा के तहत 1700 से अधिक विकास कार्यों ने न सिर्फ रोजगार बढ़ाया है, बल्कि पलायन को भी कम किया है। गांवों में तालाब, कुएं, आंगनबाड़ी, पंचायत भवन और सड़क जैसे कामों ने लोगों के जीवन को आसान बनाया है।
बेलनार जैसे गांव, जहां कभी नक्सली दहशत के कारण लोग पलायन कर गए थे, अब फिर से आबाद हो रहे हैं। यहां आजीविका डबरी के जरिए मछली पालन और सब्जी उत्पादन जैसे कार्य शुरू होने जा रहे हैं, जिससे ग्रामीणों की आमदनी बढ़ेगी।
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हजारों परिवारों को पक्के घर मिले हैं, जिससे उनका जीवन अब ज्यादा सुरक्षित और सम्मानजनक हो गया है।
बीजापुर के अलग-अलग गांवों में बदलाव की तस्वीर साफ दिखती है—
दुगाली में बना कुआं अब 100 से ज्यादा लोगों के लिए जीवनरेखा है
पालनार में प्रशासन की पहुंच और निर्माण कार्य तेज हुए हैं
कावड़गांव में पहली बार सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क पहुंचा
बांगोली में अब राशन गांव में ही उपलब्ध है
सिर्फ बुनियादी सुविधाएं ही नहीं, बल्कि युवाओं के लिए भी नए रास्ते खुले हैं। आत्मसमर्पित नक्सलियों और स्थानीय युवाओं को राजमिस्त्री जैसे कौशल सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।
अब बीजापुर के गांवों में एक नई कहानी लिखी जा रही है—डर से विकास तक की कहानी, जहां भरोसा लौट रहा है और जिंदगी आगे बढ़ रही है।




