Defeated cancer 1 time, left 3 government jobs, Sanjay of Mahasamund got selected in UPSC

3 बार कैंसर को दी मात, छोड़ी 3 सरकारी नौकरीयां, महासमुंद के संजय का हुआ UPSC में चयन

कहते हैं कि मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है. आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के एक ऐसे ही ‘रियल लाइफ हीरो’ से, जिसने न केवल देश की सबसे कठिन यूपीएससी परीक्षा पास की, बल्कि 6 साल तक 3 बार कैंसर से भी जंग जीती. महासमुंद के बेलटूकरी गांव के एक किसान के बेटे संजय डहरिया ने वो कर दिखाया है, जो आज देश के लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल बन गया है. आइए जानते हैं इनके संघर्ष की दास्ताँ आज फोर्थ आई न्यूज़ के माध्यम से…

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का एक छोटा सा गांव बेलटूकरी. यहाँ की मिट्टी में पले-बढ़े संजय डहरिया की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे संजय बचपन से ही मेधावी थे . प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई, तो कक्षा पांचवीं में उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय माना के लिए हो गया . लेकिन असली परीक्षा तब शुरू हुई जब 2012 में उन्हें पता चला कि उन्हें लार ग्रंथियों यानी Salivary Gland का कैंसर है . जब लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते हैं, तब संजय ने अस्पताल के बिस्तर से अपने सपनों को पालना शुरू किया.

संजय का संघर्ष केवल बीमारी तक सीमित नहीं था. उनके सामने करियर और लक्ष्य के बीच चुनाव की बड़ी चुनौती थी. उन्होंने यूपीएससी के अपने जुनून के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-तीन सरकारी नौकरियां छोड़ दीं . भारतीय स्टेट बैंक, आईडीबीआई बैंक और अंत में महासमुंद डाक विभाग की सुरक्षित नौकरी को उन्होंने केवल इसलिए तिलांजलि दे दी ताकि वे आईएएस बनने के अपने सपने को पूरा कर सकें . 2012 से 2018 तक मुंबई में कैंसर का इलाज चला, शारीरिक कष्ट झेले, दृष्टि में भी आंशिक बाधा आई, लेकिन हौसला हिमालय जैसा अडिग रहा.

इलाज के बाद संजय ने खुद को किताबों के हवाले कर दिया. रायपुर की नालंदा लाइब्रेरी उनके संघर्ष की गवाह बनी, जहाँ उन्होंने ‘8-8-8’ के कड़े नियम का पालन किया—यानी 8 घंटे पढ़ाई, 8 घंटे बाकी काम और 8 घंटे आराम . समाजशास्त्र को अपना वैकल्पिक विषय बनाकर उन्होंने तीसरे प्रयास में 946वीं रैंक हासिल की और पूरे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर दिया . आज संजय की इस सफलता पर महासमुंद कलेक्टर से लेकर आम जनता तक गर्व महसूस कर रही है.

संजय डहरिया की यह जीत केवल एक रैंक नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो मुश्किलों के सामने घुटने टेक देते हैं. संजय अब प्रशासनिक सेवा के जरिए देश की सेवा करना चाहते हैं और Fourth Eye News इस जांबाज बेटे के जज्बे को सलाम करता है.

4rtheye web Desk
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