महाशक्तियों के युद्ध के बीच भारत का ‘मास्टरस्ट्रोक’! अमेरिका-ईरान तनाव के बावजूद दिल्ली का दबदबा कायम, खाड़ी देशों में भारत की तूती बोली

पश्चिम एशिया में जारी भीषण युद्ध और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते खूनी टकराव के बीच बीते 24 घंटों में भारत ने अपनी स्वतंत्र, संप्रभु और मजबूत विदेश नीति का ऐसा लोहा मनवाया है, जिससे दुनिया की तमाम महाशक्तियां हैरान हैं। जहाँ एक तरफ अमेरिका, इजराइल और ईरान एक-दूसरे पर मिसाइलें बरसा रहे हैं और पूरे खाड़ी क्षेत्र का व्यापार ठप होने की कगार पर है, वहीं दूसरी तरफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बिना किसी दबाव के सुरक्षित रखा है। बीते 24 घंटों के घटनाक्रम में भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा हित किसी भी वैश्विक दबाव के मोहताज नहीं हैं।
वैश्विक कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होने और वैश्विक तेल संकट के बावजूद भारत ने अपने कूटनीतिक नेटवर्क का ऐसा इस्तेमाल किया है कि उसके ऊर्जा मार्ग और समुद्री व्यापारिक जहाज पूरी तरह सुरक्षित हैं। भारत ने अमेरिका के दबाव के बावजूद ईरान और खाड़ी देशों के साथ अपने सीधे संवाद माध्यमों को बनाए रखा है, जबकि दूसरी ओर इजराइल और अमेरिका के साथ अपनी शीर्ष स्तरीय रक्षा साझेदारी में रत्ती भर भी आंच नहीं आने दी है। पेंटागन और व्हाइट हाउस दोनों ने भारतीय रुख का सम्मान करते हुए स्वीकार किया है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत ही शांति और स्थिरता का एकमात्र असली गार्जियन (रक्षक) है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे संकट में जहाँ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश मात्र बिचौलिये की भूमिका निभाने के लिए छटपटा रहे हैं, वहीं भारत ने अपनी तटस्थ और शक्तिशाली छवि के बल पर वैश्विक व्यवस्था में अपनी निर्णायक भूमिका सिद्ध कर दी है। भारत की तेल कंपनियों को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों से विशेष आपूर्ति का आश्वासन मिला है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह सख्त संदेश दिया है कि भारतीय हितों, भारतीय नौसैनिक परिसंपत्तियों और उसके नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा। यह भारत के आक्रामक और निडर कूटनीतिक विजन का ही नतीजा है कि अमेरिका, इजराइल और ईरान—तीनों ही प्रमुख देश भारत के रुख को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं।




