घुटने भर पानी और खुले तारों ने ली मासूम छात्रा की जान, इस सरकारी और कॉरपोरेट कत्ल का जिम्मेदार कौन?
ठाणे में लापरवाही की पराकाष्ठा

यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक कॉरपोरेट कत्ल है! मुंबई और उसके उपनगरों में मानसून की पहली दस्तक ने ही प्रशासन और बिजली कंपनियों के खोखले दावों की पोल खोलकर रख दी है। ठाणे में 17 वर्षीय एक होनहार छात्रा की बारिश के पानी में फैले करंट की चपेट में आने से दर्दनाक मौत हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित परिवार के बयानों के मुताबिक, ‘टोरेंट पावर लिमिटेड’ को इस इलाके में खुले और लटकते तारों को लेकर लगातार कई बार शिकायतें भेजी गई थीं। लेकिन मुनाफे की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी इस कंपनी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। अधिकारियों ने इन चेतावनियों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया, जिसका खामियाजा एक मासूम बच्ची को अपनी जान गंवाकर चुकाना पड़ा।
यह घटना व्यवस्था के चेहरे पर एक करारा तमाचा है। नवी मुंबई में भी इसी तरह सड़क पर भरे पानी में करंट उतरने से दो महिलाएं बाल-बाल बचीं। हर साल मानसून से पहले ‘प्री-मानसून मेंटेनेंस’ के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट डकारने वाले भ्रष्ट अधिकारियों और निजी ऑपरेटरों की जवाबदेही कब तय होगी? क्या भारतीय नागरिकों की जान इतनी सस्ती है कि वे टैक्स भी दें और बुनियादी नागरिक सुरक्षा के अभाव में सड़कों पर कीड़े-मकोड़ों की तरह मरें? बिजली नियामक संस्थाओं और स्थानीय प्रशासन की यह चुप्पी अपराधियों को संरक्षण देने जैसी है। इस पूरे तंत्र को तुरंत कटघरे में खड़ा कर टोरेंट पावर के जिम्मेदार अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।



