माटी का वो लाल जिसने गरीबों का पेट भरने के लिए ब्रिटिश हुकूमत को ललकारा: पढ़िए छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह की शौर्य गाथा!

(Fourth Eye News): छत्तीसगढ़ की वीर वसुंधरा ने ऐसे अनेक सूरमाओं को जन्म दिया है, जिन्होंने मातृभूमि के सम्मान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इन्हीं अमर बलिदानियों में शीर्ष स्थान पर विराजते हैं सोनाखान के माटीपुत्र शहीद वीर नारायण सिंह। उन्हें 1857 की क्रांति में छत्तीसगढ़ का पहला शहीद माना जाता है, जिनकी रगों में मातृभूमि के प्रति अटूट भक्ति और अन्याय के खिलाफ धधकती ज्वाला बहती थी।
जब अकाल में गरीबों का मसीहा बना सोनाखान का जमींदार
सन 1856 में जब छत्तीसगढ़ का एक बड़ा हिस्सा भयंकर अकाल की चपेट में था और जनता दाने-दाने को तरस रही थी, तब एक क्रूर व्यापारी ने अनाज का विशाल भंडार दबा रखा था। वीर नारायण सिंह से अपनी जनता की भूखी चीखें बर्दाश्त नहीं हुईं। उन्होंने उस व्यापारी के गोदाम से अनाज निकालकर भूखे ग्रामीणों में बंटवा दिया। इस स्वाभिमानी और परोपकारी कार्य को ब्रिटिश सरकार ने ‘अपराध’ माना और उन्हें बंदी बना लिया।
तोप के सामने हंसते-हंसते न्योछावर कर दिए प्राण
जेल की सलाखें इस वीर योद्धा का मनोबल नहीं तोड़ सकीं। वे जेल तोड़कर बाहर निकले और 500 पराक्रमी आदिवासियों की अपनी एक सेना बनाई। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अंग्रेजों की सशस्त्र सेना को नाकों चने चबवा दिए। अंततः अंग्रेजों ने छल-बल से उन्हें बंदी बनाया और 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर सरेआम तोप से बांधकर फांसी दे दी। वीर नारायण सिंह की यह अमर शहादत आज भी हर भारतीय के हृदय में देशभक्ति का अलख जगाती है।




