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नारायणपुर में टसर रेशम से बदली ग्रामीणों की तकदीर, 50 दिन की मेहनत से लाखों की कमाई

रायपुर। छत्तीसगढ़ के वनांचल इलाके नारायणपुर में टसर रेशम उत्पादन ग्रामीणों और आदिवासी परिवारों के लिए आर्थिक मजबूती का बड़ा जरिया बनता जा रहा है। रेशम विभाग द्वारा संचालित ‘टसर रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम’ ने उन परिवारों को नई पहचान दी है, जो पहले मजदूरी और पलायन पर निर्भर थे। अब यही ग्रामीण अपने गांव में रहकर साल में तीन फसलें लेकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहे हैं।

रेशम विभाग ने योजना को आसान और पारदर्शी बनाते हुए स्व-सहायता समूहों के माध्यम से टसर कृमिपालन को बढ़ावा दिया है। ग्रामीणों को सिर्फ 2 रुपये की अनुदान दर पर टसर कृमि के अंडे उपलब्ध कराए जाते हैं। करीब 45 से 50 दिनों की देखरेख के बाद तैयार होने वाले ककून को बेचने के लिए भी किसानों को भटकना नहीं पड़ता। विभाग द्वारा स्थापित ‘ककून बैंक’ में तय सरकारी दरों पर सीधे खरीदी की जाती है, जिससे बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह खत्म हो गई है।

इस योजना की सबसे बड़ी सफलता ग्राम डूमरतराई में देखने को मिली, जहां 10 महिलाओं और 5 पुरुषों सहित 15 ग्रामीणों ने मिलकर 2 लाख 11 हजार 167 नग कोसाफल का उत्पादन किया। इस उत्पादन से समूह को कुल 9 लाख 34 हजार 927 रुपये की आमदनी हुई। हर हितग्राही के हिस्से में औसतन 62 हजार 328 रुपये की अतिरिक्त आय आई, जो सीधे उनके बैंक खातों में जमा की गई।

टसर रेशम योजना केवल एक सीजन तक सीमित नहीं है। कृमिपालन खत्म होने के बाद भी जंगलों में निराई, गुड़ाई और पौधों के रखरखाव जैसे कार्यों के जरिए ग्रामीणों को सालभर रोजगार मिलता है। इससे स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और महिलाओं का आत्मविश्वास भी तेजी से बढ़ा है।

नारायणपुर का यह मॉडल अब पूरे बस्तर संभाग के लिए ग्रामीण आजीविका और महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल बनता जा रहा है।

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