‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की अग्निपरीक्षा! अमेरिकी दबाव को ठेंगा दिखाकर भारत ने थामा ईरान का हाथ, चाबहार पर झुका वाशिंगटन

वैश्विक कूटनीति में जब देश अपने फायदे के लिए रंग बदलते हैं, तब भारत ने एक बार फिर अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का लोहा मनवाया है। मध्य पूर्व में जारी भीषण युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार के बावजूद, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेशकियन से फोन पर लंबी बात कर साफ संदेश दे दिया है कि भारत अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त ईरान को अकेले छोड़ने वाला नहीं है। ईरान के राष्ट्रपति ने पीएम मोदी को क्षेत्र की ताजा सूरतेहाल से अवगत कराया है, जिस पर भारत ने बिना किसी पश्चिमी दबाव के साफ कहा कि वह खाड़ी क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
अमेरिका और इजराइल ने लगातार कोशिश की कि भारत ईरान के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को पूरी तरह तोड़ ले। ब्रिक्स (BRICS) विदेश मंत्रियों की बैठक में भी ईरान ने भारत से पश्चिमी आक्रामकता के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग की थी। हालांकि, भारत ने बेहद चतुराई और आक्रामकता से काम लेते हुए युद्ध की सीधी निंदा से बचते हुए भी ईरान के साथ अपने चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के प्रोजेक्ट्स को और तेज कर दिया है। चाबहार पोर्ट भारत के लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि यह पाकिस्तान को दरकिनार कर मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देता है।
ईरान के उद्योग और व्यापार मंत्री मोहम्मद अताबाक और भारतीय मंत्रियों के बीच हुई हालिया बैठकों ने यह साबित कर दिया है कि नई दिल्ली वाशिंगटन के किसी भी ‘डिक्टेट’ को स्वीकार नहीं करेगी। भारत की इस आक्रामक कूटनीति ने अमेरिका को भी बैकफुट पर धकेल दिया है। अमेरिका जो कल तक ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंधों की धमकी दे रहा था, वह आज भारत के आर्थिक और भू-राजनीतिक कद को देखते हुए चाबहार परियोजना पर चुप्पी साधने को मजबूर है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी महाशक्ति के इशारे पर नहीं, बल्कि उसके खुद के राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर तय होगी।




