NMC का ‘चुनावी मरहम’ या वाकई बदलेगी तस्वीर? छत्तीसगढ़ को मिले 5 नए मेडिकल कॉलेज, पर डॉक्टर कहां से लाओगे साई बाबू?

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सिस्टम के गाल पर जो तमाचा लगा था, उस पर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने आखिरकार एक मरहम लगा दिया है। सूबे के पांच नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों (गीदम, कुनकुरी, मनेंद्रगढ़, जांजगीर-चांपा और कवर्धा) को सशर्त मंजूरी मिल गई है, जिससे राज्य में 250 एमबीबीएस सीटें बढ़ेंगी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साई इस फैसले को ऐतिहासिक बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री जी, जरा रुकिए और जनता को यह बताइए कि पहले से चल रहे मेडिकल कॉलेजों में जो डॉक्टरों, प्रोफेसरों और बुनियादी ढांचे का अकाल पड़ा है, उसे कौन दूर करेगा?
पिछली बार एनएमसी ने कमियों का हवाला देकर इन कॉलेजों की अर्जी को कूड़ेदान में डाल दिया था। अब आनन-फानन में कागजी कमियां तो दुरुस्त कर ली गईं, लेकिन क्या आदिवासी अंचलों के इन नए कॉलेजों में मरीजों को सिर्फ दीवारें और सीटें देखने को मिलेंगी? बस्तर के गीदम या जशपुर के कुनकुरी में आज भी सीनियर डॉक्टरों की तैनाती करना सरकार के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। नेता केवल फीता काटने और चुनावी रैलियों में वाहवाही लूटने के लिए बिल्डिंग खड़ी कर देते हैं, लेकिन जब इलाज की बारी आती है, तो गरीब मरीजों को आज भी रायपुर या बिलासपुर के चक्कर काटने पड़ते हैं। सीटें बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन अगर इन कॉलेजों में पढ़ाने के लिए फैकल्टी ही नहीं होगी, तो यहाँ से निकलने वाले डॉक्टर देश का भला करेंगे या मरीजों की जान से खिलवाड़? छत्तीसगढ़ की जनता को अब खोखले वादों की नहीं, बल्कि धरातल पर काम करने वाले अस्पतालों और डॉक्टरों की जरूरत है।



