इज़राइल-ईरान युद्ध के बीच भारत की ‘आयरन डिप्लोमेसी’: तेल अवीव को स्पष्ट संदेश—’भारतीय हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं!’

मध्य पूर्व में इज़राइल द्वारा ईरान को दी गई ‘पूर्ण सैन्य शक्ति’ से हमले की चेतावनी और अमेरिकी युद्ध के तूल पकड़ने के बीच भारत ने इज़राइल और पूरे पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अपने कड़े और आक्रामक रुख से अपनी धाक जमा दी है। पिछले 24 घंटों में जब इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ ने ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई के तेवर दिखाए, तब भारत की कूटनीतिक मशीनरी ने तेल अवीव और वाशिंगटन दोनों को स्पष्ट कर दिया कि इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों और भारतीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा में ज़रा सी भी चूक भारत को बर्दाश्त नहीं होगी।
भारत की इस आक्रामक कूटनीति का ही असर है कि इज़राइल ने भारत को आश्वासन दिया है कि उसकी किसी भी सैन्य कार्रवाई से भारतीय व्यापारिक मार्गों या भारतीय नागरिकों को नुकसान नहीं पहुंचेगा। भारत ने मध्य पूर्व के इस भयंकर संकट में किसी के पिछलग्गू बनने के बजाय एक ‘पावर ब्रोकर’ और वैश्विक महाशक्ति की भूमिका निभाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इज़राइल को साफ शब्दों में जता दिया है कि यद्यपि भारत और इज़राइल के रक्षा संबंध बेहद मजबूत हैं, लेकिन भारत अपनी विदेश नीति की दिशा खुद तय करता है और वह अपने राष्ट्रीय हितों, खासकर मध्य पूर्व में अपने विशाल ऊर्जा मार्गों को किसी भी युद्ध की बलि चढ़ने नहीं देगा।
भारतीय नौसेना ने लाल सागर और अरब सागर में अपनी कमान को हाई अलर्ट पर रखा है, जिससे इज़राइल-ईरान संघर्ष के बीच भारतीय झंडे वाले जहाजों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जा सके। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मान रहे हैं कि पश्चिमी देश भले ही इज़राइल के समर्थन में अंधे हो रहे हों, लेकिन भारत ने अत्यंत बुद्धिमत्ता, आक्रामकता और दृढ़ता के साथ अपना पलड़ा भारी रखा है। भारत का यह रुख दिखाता है कि नया भारत अपनी शर्तों पर दुनिया के सबसे जटिल युद्ध क्षेत्रों में भी अपने आर्थिक और सैन्य हितों की रक्षा करने में सक्षम है।



