होर्मुज की खाड़ी में महायुद्ध? अमेरिका-सऊदी के संयुक्त हमले के बाद ईरान की परमाणु धमकी!

मिडल ईस्ट की ज़मीन पर बारूद की गंध इतनी खतरनाक हो चुकी है कि एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की आग में झोंकने के लिए काफी है। क्या दुनिया एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता? पिछले 24 घंटों में अमेरिका और सऊदी अरब के लड़ाकू विमानों ने ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों को जिस तरह निशाना बनाया है, उसने साफ कर दिया है कि कूटनीति के सारे रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं।
घटनाक्रम का ताज़ा विवरण:
सऊदी की खुली एंट्री: पहली बार सऊदी अरब ने आधिकारिक तौर पर अमेरिकी वायुसेना के साथ मिलकर इराक में ईरान समर्थित ठिकानों पर ताबड़तोड़ एयरस्ट्राइक की हैं।
जॉर्डन पर हमला और पलटवार: ईरान द्वारा जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे मुवफ्फक साल्टी पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने के बाद वाशिंगटन ने कठोर सैन्य प्रतिक्रिया दी है।
मिसाइलों की कमी की रिपोर्ट: पेंटागन के पास अपनी अत्याधुनिक ‘टॉमाहॉक’ और ‘ATACMS’ मिसाइलों का बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है, जिसने अमेरिकी सैन्य रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पृष्ठभूमि और इतिहास:
अमेरिका और ईरान के बीच की यह दुश्मनी 1979 की इस्लामिक क्रांति और उसके बाद के दशकों से चली आ रही है। वर्ष 2026 में सैन्य तनाव तब चरम पर पहुँच गया जब परमाणु वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी-इजरायली हमलों में उच्च-स्तरीय ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाया गया। तब से ईरान ने होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz)—जो दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20% आपूर्ति मार्ग है—पर अपनी मजबूत पकड़ का इस्तेमाल हथियार की तरह किया है।
किसने क्या किया और दावे:
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (CENTCOM) का दावा है कि ये हमले अमेरिकी सेना और सहयोगियों की सुरक्षा के लिए ‘सटीक और निवारक’ थे। दूसरी ओर, तेहरान का रुख सख्त है; ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि जब तक उनके खिलाफ प्रतिबंध और नाकेबंदी खत्म नहीं होती, तब तक होर्मुज से गुजरने वाले किसी भी जहाजरानी मार्ग को सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
भारत पर असर:
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का भारी हिस्सा मध्य पूर्व के तेल और एलएनजी (LNG) से पूरा करता है। होर्मुज में रुकावट का सीधा मतलब है भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों में तेज उछाल, मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी और खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा पर सीधा खतरा।
सबसे बड़ा सवाल:
क्या अमेरिका मिसाइलों के घटते भंडार के बावजूद तेहरान में पूर्ण सत्ता परिवर्तन कराने की जिद पर अड़ा रहेगा, या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के पूरी तरह तबाह होने से पहले दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुँचेंगे?




