कश्मीर पर अमेरिका की नजर, भारत ने खींची लाल रेखा—उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, मामला दिल्ली सुलझाएगी वॉशिंगटन नहीं!

अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए विशेष दूत सर्जियो गोर 19 अगस्त को जम्मू-कश्मीर पहुंचे। यह उनकी भारत में पद संभालने के बाद जम्मू-कश्मीर की पहली यात्रा है। उनकी यात्रा ऐसे समय हुई है जब कश्मीर को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों में संवेदनशीलता बनी हुई है।
अमेरिकी राजदूत की यात्रा पर सबसे अहम राजनीतिक संदेश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ओर से आया। उन्होंने साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान केंद्र सरकार और यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था के जरिए होगा, वॉशिंगटन के जरिए नहीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी राजदूत के साथ मुलाकात में वह क्षेत्र के आंतरिक मुद्दों को अमेरिका के सामने उठाने नहीं जा रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां भारत की संवेदनशीलता साफ दिखाई देती है। कश्मीर भारत का आंतरिक और संप्रभुता से जुड़ा विषय है। इसलिए किसी भी विदेशी शक्ति की भूमिका को लेकर नई दिल्ली की नीति लंबे समय से स्पष्ट रही है कि भारत अपने आंतरिक मामलों में बाहरी मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता।
सर्जियो गोर ने अपनी यात्रा के दौरान जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और संकेत दिया कि क्षेत्र को लेकर अमेरिकी यात्रा सलाह की समीक्षा की जा सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में संदेश दो तरफा है। अमेरिका कश्मीर की स्थिति को समझना चाहता है, लेकिन भारत के भीतर से ही यह आवाज उठ रही है कि कश्मीर का भविष्य तय करने का अधिकार भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों के पास है।
यात्रा ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि कश्मीर के मुद्दे पर विदेशी दिलचस्पी कितनी स्वीकार्य है और भारत अपनी संप्रभुता की सीमा कहां तक खींचता है। फिलहाल संदेश साफ है—कश्मीर पर अंतिम फैसला दिल्ली और जम्मू-कश्मीर की जनता के लोकतांत्रिक ढांचे में होगा, वॉशिंगटन में नहीं।
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