बिहार की राजनीति में दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव परिणाम चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। यहां वोटों की गिनती में करीब 57 घंटे लग गए और इस दौरान भाजपा तथा राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ता चला गया। शुरुआत में भाजपा उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए थे, लेकिन दूसरी वरीयता के मतों की गिनती ने पूरा चुनावी गणित बदल दिया। आखिरकार राजद उम्मीदवार अनिल कुमार झा ने भाजपा के मौजूदा विधान परिषद सदस्य सर्वेश कुमार को 4,010 मतों से शिकस्त दे दी।
31 अक्टूबर की सुबह प्रकाशित विस्तृत रिपोर्ट में इस असामान्य रूप से लंबी मतगणना और उसके दौरान लगे आरोपों का पूरा विवरण सामने आया है। हालांकि परिणाम गुरुवार रात घोषित किया गया था, लेकिन 31 अक्टूबर को भी यह चुनावी विवाद और मतगणना प्रक्रिया चर्चा में रही।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा मतगणना की अवधि को लेकर हुई। दरभंगा स्नातक सीट के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। मतगणना 27 अक्टूबर की सुबह शुरू हुई और परिणाम घोषित होने तक लगभग 57 घंटे का समय लग गया। बिहार की आठ विधान परिषद सीटों में इस निर्वाचन क्षेत्र की मतगणना सबसे लंबी रही।
इस सीट पर कुल 40 उम्मीदवार मैदान में थे। पहले वरीयता के मतों की गिनती में किसी भी प्रत्याशी को जीत के लिए निर्धारित मतों का आंकड़ा हासिल नहीं हुआ। इसी वजह से दूसरी वरीयता के मतों की गिनती और उम्मीदवारों को क्रमशः बाहर करने की प्रक्रिया अपनानी पड़ी।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक राजद के अनिल कुमार झा को 25,406 मत मिले, जबकि भाजपा के सर्वेश कुमार को 21,396 मत प्राप्त हुए। जन सुराज पार्टी के मोहम्मद इम्तियाज को 12,823 मत मिले। इस तरह राजद उम्मीदवार ने 4,010 मतों के अंतर से जीत दर्ज की।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि शुरुआती मतगणना में भाजपा उम्मीदवार लगातार आगे चल रहे थे। लेकिन चुनाव की दूसरी वरीयता प्रणाली ने परिणाम बदल दिया। जब कम मत पाने वाले उम्मीदवारों को मुकाबले से बाहर किया गया तो उनके मतपत्रों पर दर्ज अगली पसंद के मत शेष उम्मीदवारों में स्थानांतरित किए गए।
इस प्रक्रिया में 40 में से 37 उम्मीदवार बाहर हो गए। अंतिम चरण में भाजपा के सर्वेश कुमार, राजद के अनिल कुमार झा और जन सुराज के मोहम्मद इम्तियाज मुकाबले में रह गए। इसके बाद वरीयता मतों के स्थानांतरण ने राजद उम्मीदवार को बढ़त दिलाई।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान विवाद भी कम नहीं हुआ। राजद नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि लगभग 10 प्रतिशत मतों को अवैध घोषित किया गया और मतगणना में अनावश्यक देरी की गई। उनका दावा था कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
दूसरी तरफ जिला प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए मतगणना को नियमों के अनुरूप बताया। दरभंगा के जिलाधिकारी कौशल कुमार के मुताबिक यह चुनाव सामान्य मतगणना से अलग था, क्योंकि इसमें एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के तहत वरीयता क्रम के अनुसार वोटों का हस्तांतरण किया जाता है।
प्रशासन ने बताया कि इस निर्वाचन क्षेत्र में 69,141 मत पड़े थे। इनमें से 5,321 मत अमान्य घोषित किए गए और 63,820 मत वैध पाए गए। जीत के लिए आवश्यक मतों की संख्या 31,911 निर्धारित थी। कोई भी उम्मीदवार पहली वरीयता में यह आंकड़ा हासिल नहीं कर सका।
मतगणना केंद्र पर विवाद की स्थिति भी बनी। राजनीतिक दलों के मतगणना एजेंटों के बीच कहासुनी और हंगामे के बाद पांच लोगों को हिरासत में लिया गया था। प्रशासन के अनुसार बाद में उन्हें निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया। जिलाधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस घटना से मतगणना प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई।
राजद उम्मीदवार अनिल कुमार झा ने जीत के बाद प्रशासन को निष्पक्ष बताया और कहा कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई। वहीं भाजपा के लिए यह परिणाम राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी उम्मीदवार लंबे समय तक शुरुआती बढ़त बनाए हुए थे।
इस चुनाव ने बिहार की राजनीति में वरीयता आधारित मतदान प्रणाली को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। आम विधानसभा चुनावों में जहां सीधे मतों की गिनती से परिणाम तय होते हैं, वहीं स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में दूसरी तथा आगे की वरीयताओं का महत्व काफी बढ़ जाता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजद ने भाजपा से यह सीट छीन ली। शुरुआती बढ़त के बावजूद हार ने भाजपा के चुनावी प्रबंधन और मतगणना की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि इसे किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत मानने से पहले पूरे बिहार के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के परिणामों को भी देखना होगा।
दूसरी ओर तेजस्वी यादव के आरोपों और प्रशासन की सफाई के बीच यह मामला चुनावी पारदर्शिता की बहस को फिर सामने ले आया है। मतगणना में देरी का कारण तकनीकी और प्रक्रियागत जटिलता बताया गया है, जबकि विपक्ष ने इस दौरान अनियमितताओं की आशंका जताई थी। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शुरुआती बढ़त हमेशा अंतिम जीत की गारंटी नहीं होती। दूसरी वरीयता के मतों ने ऐसा राजनीतिक उलटफेर किया, जिसने भाजपा की उम्मीदों को झटका दिया और राजद को बड़ी राहत पहुंचाई।












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