बस्तर में माओवाद के खिलाफ अभियान के बाद अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जिन नेताओं के काफिले कभी भारी सुरक्षा घेरे में चला करते थे, अब उनकी सुरक्षा में कटौती की तैयारी ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। राज्य सरकार ने बस्तर संभाग के 116 राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा श्रेणी कम करने का फैसला किया है। सरकार इसे बदलती सुरक्षा परिस्थितियों और माओवादी हिंसा में आई गिरावट का परिणाम बता रही है, लेकिन कांग्रेस ने इस फैसले पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बस्तर में खतरा वास्तव में समाप्त हो चुका है या फिर सुरक्षा व्यवस्था में जल्दबाजी की जा रही है?
बस्तर में दशकों तक माओवादी हिंसा ने आम लोगों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को भय के साये में रखा। कई राजनीतिक नेताओं और उनके परिवारों को लगातार सुरक्षा घेरे में रहना पड़ा। वर्ष 2013 का झीरम घाटी हमला आज भी छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय माना जाता है। इस हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की जान चली गई थी। महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेताओं को खोने के बाद बस्तर में राजनीतिक प्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर सरकारों ने विशेष इंतजाम किए थे।
अब 31 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार ने 116 नेताओं की सुरक्षा श्रेणी में बदलाव का फैसला किया है। इनमें मंत्री केदार कश्यप, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व मंत्री महेश गागड़ा और कवासी लखमा सहित महेंद्र कर्मा के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं। नौ प्रमुख नेताओं की सुरक्षा Z+ से घटाकर Z श्रेणी में की जा रही है। अन्य नेताओं की सुरक्षा Z से Y+ और Y+ से Y श्रेणी में की जाएगी।
गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के अनुसार यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे छह महीने की सुरक्षा समीक्षा और खतरे के आकलन की प्रक्रिया रही है। सरकार का तर्क है कि 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके बाद भी तत्काल सुरक्षा हटाने के बजाय छह महीने तक परिस्थितियों की निगरानी की गई।
इस फैसले का एक बड़ा पहलू पुलिस बल की तैनाती से भी जुड़ा है। उपलब्ध पुलिस आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 400 लोगों की सुरक्षा के लिए 1,550 से अधिक जवान और 500 वाहन लगाए गए हैं। अकेले बस्तर में 250 से अधिक लोगों की सुरक्षा में 1,000 से ज्यादा जवान तैनात हैं। सरकार का मानना है कि सुरक्षा में आवश्यक बदलाव से पुलिस संसाधनों को दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में लगाया जा सकेगा।
लेकिन कांग्रेस इस दलील से संतुष्ट नहीं है। दीपक बैज ने कहा है कि माओवादी गतिविधियों में कमी जरूर आई है, लेकिन खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा घटाने के बाद किसी जनप्रतिनिधि के साथ कोई घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी। कांग्रेस का सवाल है कि अंदरूनी इलाकों में जाने वाले नेताओं की सुरक्षा का आकलन किस आधार पर किया गया है।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सरकार ने अभी तक उन सभी 116 नेताओं की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है, जिनकी सुरक्षा घटाई जा रही है। गृह विभाग का विस्तृत औपचारिक आदेश भी सामने आने का इंतजार है। ऐसे में फैसले के क्रियान्वयन और वास्तविक सुरक्षा बदलाव को लेकर कई सवाल बने हुए हैं।
दरअसल, यह केवल सुरक्षा घटाने या बढ़ाने का मामला नहीं है। इसके पीछे बस्तर में शांति स्थापना, पुलिस संसाधनों के इस्तेमाल और राजनीतिक विश्वास का बड़ा सवाल जुड़ा हुआ है। सरकार अपनी कार्रवाई को माओवादी प्रभाव में आई कमी का संकेत बता रही है, जबकि विपक्ष इसे संभावित खतरे को हल्के में लेने का फैसला मान रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा समीक्षा में किन मानकों को आधार बनाया गया है और क्या सरकार संवेदनशील इलाकों में जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा के लिए अलग व्यवस्था बनाए रखेगी। बस्तर में शांति का दावा तभी मजबूत होगा, जब आम नागरिकों के साथ राजनीतिक प्रतिनिधियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित रहेगी।
अब असली परीक्षा सरकार की है। माओवादी हिंसा में कमी को स्थायी शांति में बदलना बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की चूक पूरे प्रदेश के लिए गंभीर साबित हो सकती है।














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