स्कूल में बच्चों तक पहुंची आसाराम से जुड़ी किताबें! बवाल मचा तो प्रिंसिपल पर गिरी गाज, अब खुलेंगे कई राज

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छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से सामने आई इस खबर ने सरकारी स्कूलों की व्यवस्था और बच्चों तक पहुंचने वाली सामग्री को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस स्कूल में बच्चों को शिक्षा, अनुशासन और भविष्य की तैयारी का रास्ता दिखाया जाना चाहिए, वहीं कथित तौर पर आसाराम से जुड़ी पुस्तिकाएं बच्चों तक पहुंचने का मामला सामने आया है। विवाद इतना बढ़ा कि शिक्षा विभाग को कार्रवाई करनी पड़ी और सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल को उनके पद से हटाकर कलेक्टर कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया। मामला सामने आते ही सवालों की बौछार शुरू हो गई—आखिर ये किताबें स्कूल के अंदर पहुंचीं कैसे? इन्हें बच्चों तक किसने पहुंचाया? और क्या स्कूल प्रशासन को इसकी जानकारी थी?

मामला बलरामपुर जिले के रघुनाथपुर स्थित स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेजी माध्यम उत्कृष्ट विद्यालय का है। रिपोर्ट के मुताबिक 26 अक्टूबर को स्कूल में यह घटनाक्रम हुआ। स्कूल में 100 से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ते हैं और कथित तौर पर 25 से 30 मिडिल स्कूल के बच्चों को कुछ पुस्तिकाएं वितरित की गईं। बच्चों के घर किताबें पहुंचने के बाद एक अभिभावक ने इस पर आपत्ति जताई और शिक्षा विभाग तक मामला पहुंचा।विवाद का सबसे बड़ा कारण इन पुस्तिकाओं का कथित तौर पर आसाराम से जुड़ा होना बताया गया। रिपोर्ट में ‘संस्कार सरिता’, ‘व्रत नियम’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसी पुस्तिकाओं का उल्लेख किया गया है। अभिभावकों की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि जिस व्यक्ति को बलात्कार के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है, उससे संबंधित सामग्री आखिर सरकारी स्कूल के बच्चों तक क्यों पहुंचाई गई।

मामला उस समय और गंभीर हो गया जब बच्चों के हाथों में इन पुस्तिकाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। इसके बाद शिक्षा विभाग ने जांच के निर्देश दिए। शुरुआती जांच के आधार पर स्कूल के प्रिंसिपल महेश प्रजापति को स्कूल से हटाकर कलेक्टर कार्यालय से संबद्ध किया गया। यह कार्रवाई अंतिम दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है, बल्कि जांच लंबित रहने के दौरान की गई प्रशासनिक कार्रवाई है।

प्रिंसिपल ने अपने बचाव में कथित तौर पर कहा कि उन्हें किताबों की वास्तविक सामग्री और उन्हें बांटने आए लोगों के बारे में जानकारी नहीं थी। उनके अनुसार, कुछ लोग किताबें बांटने की अनुमति मांगकर स्कूल पहुंचे थे और उन्होंने यह समझकर अनुमति दे दी कि सामान्य पुस्तकें वितरित की जानी हैं। यही बयान अब पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है।

क्योंकि सवाल सिर्फ किताब बांटने का नहीं है। सवाल यह है कि किसी सरकारी स्कूल में बाहरी व्यक्ति बच्चों के बीच कोई भी सामग्री लेकर पहुंचे तो उसकी जांच कौन करेगा? क्या स्कूल प्रशासन के पास ऐसी सामग्री के सत्यापन की कोई व्यवस्था है? क्या बच्चों के अभिभावकों की अनुमति के बिना बाहरी संगठन या व्यक्ति शैक्षणिक परिसर में प्रचार सामग्री बांट सकते हैं? अगर यह किताबें वास्तव में किसी विवादित व्यक्ति या संगठन से जुड़ी थीं, तो उन्हें बच्चों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी बनती है?

इस विवाद ने सरकारी स्कूलों में बाहरी गतिविधियों की निगरानी पर भी बहस छेड़ दी है। स्कूल बच्चों के लिए संवेदनशील स्थान होते हैं। वहां पहुंचने वाली हर सामग्री का असर विद्यार्थियों की सोच पर पड़ सकता है। यही वजह है कि अभिभावक अब सिर्फ प्रिंसिपल पर कार्रवाई की मांग नहीं कर रहे, बल्कि पूरे घटनाक्रम की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।

मामले में एक और संवेदनशील पहलू यह है कि किताबें कथित तौर पर मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों तक पहुंचीं। यानी ऐसे बच्चे जो अभी कम उम्र के हैं और किसी सामग्री के सामाजिक या कानूनी संदर्भ को उसी तरह नहीं समझ सकते जैसे एक वयस्क समझ सकता है। इसलिए स्कूल में वितरित होने वाली सामग्री की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

इस पूरे मामले में प्रशासन के सामने अब असली चुनौती सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि किताबें किसने बांटीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि उन्हें स्कूल में प्रवेश की अनुमति किस आधार पर मिली। यदि किसी ने स्कूल प्रशासन को गलत जानकारी देकर अनुमति हासिल की तो उस व्यक्ति या समूह की भी पहचान होनी चाहिए। वहीं यदि प्रशासन ने बिना सत्यापन के अनुमति दी तो जवाबदेही तय होनी चाहिए।

यह मामला सोशल मीडिया के दौर में इसलिए भी तेजी से चर्चा में है क्योंकि बच्चों के हाथों में पुस्तिकाओं के वीडियो सामने आने के बाद मामला दबा नहीं रह सका। एक अभिभावक की शिकायत ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को सक्रिय कर दिया।

अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर है। अगर जांच में किसी तरह की जानबूझकर की गई लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई का दायरा बढ़ सकता है। दूसरी तरफ यदि प्रिंसिपल की यह दलील सही पाई जाती है कि उन्हें किताबों की वास्तविक सामग्री की जानकारी नहीं थी, तब भी स्कूलों में बाहरी सामग्री के प्रवेश को लेकर नए नियमों की जरूरत पर बहस तेज होना तय है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—सरकारी स्कूल शिक्षा का मंदिर है या कोई ऐसा खुला मंच जहां कोई भी व्यक्ति बच्चों तक अपनी सामग्री पहुंचा दे? बलरामपुर का यह विवाद सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है कि बच्चों के हाथ में पहुंचने वाली हर किताब, हर पर्चा और हर सामग्री की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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