देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। चुनावी राजनीति में पहले से ही मतदाता सूची को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। अदालत ने चुनाव आयोग से कहा है कि यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से हटाया गया है और इसकी शिकायत सामने आती है, तो उस पर विचार किया जाना चाहिए। इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ का नाम भी सामने आया है, जहां लगभग 27 लाख नामों को लेकर याचिका दायर की गई है।
31 अक्टूबर की सुबह सामने आई रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसका अर्थ है कि यदि किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से छूट गया है या गलत तरीके से हटा दिया गया है, तो उसकी शिकायत पर विचार करने का रास्ता बंद नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने केरल में हुए SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। अदालत ने कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हट गए हैं, वे चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रख सकते हैं। आयोग को ऐसी शिकायतों पर तथ्यात्मक जांच करनी चाहिए और आवश्यक सुधार की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
इस मामले का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। चुनाव में वोट डालने का अधिकार तभी प्रभावी होता है, जब पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो। यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से हट जाता है, तो उसका मतदान का अधिकार व्यवहार में प्रभावित हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार केरल में SIR के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में लगभग 8.57 लाख नाम हटाए गए थे। कुल 26.95 करोड़ मतदाताओं के आंकड़े के मुकाबले यह संख्या सामने आई। अदालत ने कहा कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, वे अपनी शिकायत चुनाव आयोग के समक्ष रख सकते हैं।
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू छत्तीसगढ़ से जुड़ा है। राज्य में CPI नेता मनीष कुंजाम की ओर से दायर याचिका में लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में पहले नोटिस जारी होने के बावजूद चुनाव आयोग की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर चुनाव आयोग को जवाब देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद रखी गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने अभी 27 लाख नाम हटाए जाने के आरोप को सही मान लिया है। यह आरोप याचिका में उठाया गया है और आयोग को अपना पक्ष रखना है।
उत्तर प्रदेश में भी SIR को लेकर सवाल उठे हैं। वहां एक अलग याचिका में मतदाता सूची की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया गया। अदालत ने याचिकाकर्ता से संबंधित शिकायतों और अनियमितताओं का विवरण चुनाव आयोग के सामने रखने को कहा।
यह पूरा घटनाक्रम चुनाव आयोग की जिम्मेदारी और नागरिकों के मतदान अधिकार के बीच संतुलन का सवाल खड़ा करता है। एक तरफ आयोग के सामने फर्जी और अपात्र नामों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध करने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ पात्र मतदाताओं का नाम गलती से हटने से बचाना भी उतना ही जरूरी है।
SIR के समर्थकों का तर्क है कि पारदर्शी और सटीक मतदाता सूची लोकतंत्र को मजबूत करती है। वहीं विरोध करने वाले दलों और याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रक्रिया में पर्याप्त सावधानी और शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था जरूरी है। किसी भी पात्र मतदाता को केवल प्रशासनिक गलती के कारण मतदान से वंचित नहीं होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह मामला इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि 27 लाख नामों से जुड़ा आरोप राज्य की चुनावी राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। हालांकि वास्तविक स्थिति जानने के लिए चुनाव आयोग का जवाब, हटाए गए नामों का विवरण और याचिका में प्रस्तुत दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक होगा।
आने वाले चार सप्ताह इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। चुनाव आयोग अदालत के सामने क्या तथ्य रखता है, कितने नामों पर आपत्ति दर्ज हुई है और शिकायतों के समाधान के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, इन सभी सवालों के जवाब सामने आने बाकी हैं।
लोकतंत्र में चुनाव जीतना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है कि हर पात्र नागरिक को वोट डालने का अधिकार मिले। मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाता के अधिकार के बीच संतुलन ही इस विवाद का वास्तविक समाधान है।














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