गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री को लेकर कानूनी लड़ाई ने नया मोड़ ले लिया है। शुक्रवार को गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने होटल और रेस्टोरेंट संचालकों को राहत देते हुए प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंध को रद्द कर दिया था, लेकिन यह राहत ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। राज्य सरकार की तत्काल अपील पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले पर रोक लगा दी। इसके साथ ही मंदिर के आसपास नॉनवेज भोजन की बिक्री और उससे जुड़ी गतिविधियों पर पहले से लागू प्रतिबंध फिलहाल फिर प्रभावी हो गया है।
31 अक्टूबर की सुबह प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस मामले ने धार्मिक आस्था, कारोबार की स्वतंत्रता और प्रशासनिक अधिकारों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ होटल और रेस्टोरेंट संचालक इसे अपने व्यवसाय और आजीविका से जुड़ा मामला बता रहे हैं, वहीं राज्य सरकार का तर्क है कि धार्मिक महत्व वाले तीर्थ क्षेत्र में कुछ व्यावसायिक गतिविधियों पर उचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
पूरा विवाद गिर सोमनाथ जिले के प्रभास पाटन क्षेत्र से जुड़ा है। जिला प्रशासन ने 10 अगस्त 2026 को एक अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत सोमनाथ महादेव मंदिर के 500 मीटर के दायरे और धार्मिक स्थलों को जोड़ने वाले छह निर्धारित मार्गों पर मांसाहारी भोजन तैयार करने, रखने और बेचने पर रोक लगाई गई थी।
होटल और रेस्टोरेंट संचालकों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि किसी वैध व्यवसाय को केवल स्थान के आधार पर प्रतिबंधित करना उनके मौलिक अधिकारों और आजीविका को प्रभावित करता है। कारोबारियों का तर्क था कि प्रशासन को इस तरह का प्रतिबंध लगाने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार प्रस्तुत करना चाहिए।
शुक्रवार को न्यायमूर्ति निशा एम. ठाकोर की एकल पीठ ने कारोबारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जिला प्रशासन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया। इससे होटल और रेस्टोरेंट संचालकों को बड़ी राहत मिली। लेकिन राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए तत्काल खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया।
मुख्य न्यायाधीश मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निर्झर देसाई की खंडपीठ ने सरकार की अपील पर सुनवाई की और एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद प्रतिबंध फिर से लागू हो गया। अब इस विवाद पर आगे की कानूनी सुनवाई होगी।
राज्य सरकार की दलील है कि सोमनाथ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है। इसे भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। आसपास प्रभास क्षेत्र में भालका तीर्थ, त्रिवेणी संगम और गीता मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी हैं। सरकार के मुताबिक इन स्थानों पर आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और क्षेत्र की प्रकृति को ध्यान में रखकर प्रतिबंध लगाए गए हैं।
दूसरी ओर, होटल कारोबारियों के लिए यह फैसला आर्थिक महत्व रखता है। उनका कहना है कि किसी क्षेत्र में कारोबार करने की अनुमति और उस पर लगाए गए प्रतिबंधों का निर्धारण कानून के अनुसार होना चाहिए। यदि प्रतिबंध लगाया जाता है तो उसका दायरा, आधार और औचित्य स्पष्ट होना चाहिए।
इस विवाद ने एक व्यापक सवाल भी खड़ा किया है कि धार्मिक स्थलों के आसपास व्यावसायिक गतिविधियों को नियंत्रित करने की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या धार्मिक महत्व के आधार पर किसी विशेष प्रकार के भोजन की बिक्री पर रोक लगाई जा सकती है? और यदि ऐसा किया जाता है तो कारोबारियों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा कैसे होगी?
गौरतलब है कि 29 अक्टूबर को गुजरात हाईकोर्ट ने राधनपुर नगरपालिका द्वारा लगभग 30 मांस, चिकन और मछली की दुकानों तथा संबंधित कारोबारियों को चार महीने तक बंद रखने के आदेश पर भी सवाल उठाए थे। अदालत की आपत्ति के बाद नगरपालिका ने अपना आदेश वापस ले लिया था। इससे गुजरात में खाद्य कारोबार और धार्मिक आयोजनों के बीच विवाद चर्चा में आ गया है।
सोमनाथ का मामला अब केवल स्थानीय प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रहा। इसमें धार्मिक आस्था, संविधान के तहत व्यवसाय करने का अधिकार और राज्य की नियामक शक्तियां जैसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शामिल हो गए हैं।
आगे की सुनवाई में अदालत को यह तय करना होगा कि प्रशासन की अधिसूचना किस कानूनी आधार पर कायम रह सकती है और कारोबारियों की दलीलों पर किस तरह विचार किया जाएगा। फिलहाल खंडपीठ के आदेश के चलते प्रतिबंध जारी है।
एक तरफ धार्मिक क्षेत्र की मर्यादा का सवाल है, तो दूसरी तरफ कारोबार और संविधान से जुड़े अधिकारों की लड़ाई। अब सबकी नजर गुजरात हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है।












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