छत्तीसगढ़ में खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने और ग्रामीण अंचलों के खिलाड़ियों को मंच देने के लिए सरगुजा ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन किए जा रहे हैं। सरकार और प्रशासन इन आयोजनों के जरिए खेल संस्कृति को मजबूत करने के दावे करते हैं, लेकिन सरगुजा से सामने आई एक घटना ने इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे 45 से अधिक खिलाड़ी घंटों तक बस का इंतजार करते रहे। हालत यह थी कि शाम को घर लौटने वाले खिलाड़ियों को रात 11 बजे तक वाहन नहीं मिला। भूख और प्यास से परेशान खिलाड़ियों को आखिरकार विधायक से मदद मांगनी पड़ी।
यह मामला सीतापुर ब्लॉक के खिलाड़ियों से जुड़ा है। खिलाड़ी जिला स्तरीय सरगुजा ओलंपिक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए अंबिकापुर पहुंचे थे। प्रतियोगिता में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे। इनमें कई खिलाड़ी स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी भी थे।
जानकारी के अनुसार, प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद खिलाड़ियों को शाम करीब 4 बजे बस से सीतापुर वापस भेजा जाना था। इसके लिए परिवहन व्यवस्था निर्धारित थी, लेकिन निर्धारित समय पर बस नहीं पहुंची। खिलाड़ी गांधी स्टेडियम के बाहर इंतजार करते रहे। समय गुजरता गया, शाम रात में बदल गई, लेकिन खिलाड़ियों की घर वापसी का इंतजाम नहीं हो सका।
सबसे गंभीर बात यह रही कि खिलाड़ियों को भोजन और दूसरी जरूरी सुविधाओं के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, रात करीब 11 बजे तक खिलाड़ी बस का इंतजार करते रहे। इस दौरान आयोजन से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों की मौके पर मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठे।
जब खिलाड़ियों की परेशानी बढ़ गई तो उन्होंने सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो को फोन कर पूरी स्थिति बताई। इसके बाद विधायक ने तत्काल जिला प्रशासन से संपर्क किया और कलेक्टर अजीत वसंत को मामले की जानकारी दी।
कलेक्टर के निर्देश पर जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी रोमा श्रीवास्तव गांधी स्टेडियम पहुंचीं। उन्होंने खिलाड़ियों के लिए भोजन की व्यवस्था कराई और उन्हें वापस भेजने के लिए दूसरी बस बुलवाई। इसके बाद रात करीब 12 बजे खिलाड़ी सीतापुर के लिए रवाना हो सके।
अब सवाल यह है कि जब खिलाड़ियों की वापसी के लिए पहले से बस तय थी तो वह समय पर क्यों नहीं पहुंची? प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद खिलाड़ियों की देखरेख करने वाला जिम्मेदार अधिकारी कहां था? क्या आयोजन समिति ने खिलाड़ियों की सुरक्षा, भोजन और परिवहन व्यवस्था की पहले से कोई ठोस योजना बनाई थी?
रिपोर्ट में प्रतियोगिता में लगभग 1800 खिलाड़ियों के शामिल होने की जानकारी भी दी गई है। ऐसे बड़े आयोजन में परिवहन और भोजन जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। खिलाड़ियों को सम्मान और सुविधा देना किसी भी खेल आयोजन की पहली जिम्मेदारी है।
यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक खिलाड़ी सीमित संसाधनों के बावजूद खेलों में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। वे अपने गांव और ब्लॉक से निकलकर जिला स्तर तक पहुंचते हैं। ऐसे में यदि उन्हें प्रतियोगिता के बाद घर लौटने के लिए भी घंटों परेशान होना पड़े तो यह व्यवस्था की बड़ी कमजोरी मानी जाएगी।
आगामी संभाग स्तरीय प्रतियोगिता से पहले प्रशासन को इस घटना से सबक लेना होगा। केवल मंच सजाने, उद्घाटन करने और खिलाड़ियों की संख्या गिनने से खेलों का विकास नहीं होता। खिलाड़ियों के आने-जाने, भोजन, पेयजल और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अब देखना होगा कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाता है या नहीं। खिलाड़ियों को रातभर परेशानी झेलने के बाद केवल वैकल्पिक बस उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। आयोजन की व्यवस्था में हुई चूक की समीक्षा और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है।











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