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झीरम नक्सली हमले में मारे गए थे नंदकुमार पटेल, आज बेटे ने संभाली है विरासत !

स्वर्गीय नंदकुमार पटेल की कहानी

रायपुर। नमस्कार दोस्तों, फोर्थ आई न्यूज़ में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों आज हम आपको हमारे छत्तीसगढ़ के एक ऐसे राजनेता के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होनें अपने राजनैतिक जीवन में कई मुकाम हासिल किए लेकिन एक नक्सली हमले में उनकी मौत हो गई और उनका सियासी सफर अधूरा रह गया। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं छत्तीसगढ़ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे स्वर्गीय नंदकुमार पटेल की कहानी।

नंदकुमार पटेल का जन्म 8 नवंबर, 1953 को हुआ था। उनका विवाह नीला से हुआ था। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। इसमें दिनेश पटेल, सरोजनी पटेल, शशिकला पटेल और उमेश पटेल शामिल हैं। सभी बेटे-बेटियों की शादियां हो चुकी है। बेटे दिनेश पटेल, जो कि उनके साथ ही साल 2013 के नक्सली हमले में मारे गए,उनकी मृत्यु से महज़ दो साल पहले ही शादी हुई थी।

नंदकुमार पटेल ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 1979 में सरपंच के रूप में की थी। वे प्रखंड विकास समिति रायगढ़ के सदस्य चुने गए थे। पहली बार 5 मार्च, 1990 को पटेल विधायक चुने गए। इसके बाद 1990, 1993, 1998, 2003 और 2008 में वे विधायक बने और 1998 में मंत्री बने। अप्रैल, 2011 में उन्हें कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।

नंदकुमार पटेल मध्य प्रदेश विधान सभा की पुस्तकालय समिति के अप्रैल 1994 में अध्यक्ष बने। जनवरी, 1996 को पहली बार वे राज्यमंत्री बनाए गए थे। उन्होंने नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के लिए राज्यमंत्री के रूप में भी काम किया। मार्च 1998 से दिसंबर 1998 तक उन्होंने मध्य प्रदेश में गृह राज्यमंत्री के रूप में काम किया। दिसंबर 1998 से अक्टूबर 2000 तक दिग्विजय सिंह के साथ मध्य प्रदेश में गृह और विमानन विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे। 12 नंबवर, 2000 को छत्तीसगढ़ में राज्य मंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद 2003 तक गृह, जेल, परिवहन कैबिनेट मंत्री रहे। 2009 से 2011 तक छत्तीसगढ़ लोक लेखा समिति के अध्यक्ष रहे।

साल 2013 के जून में बस्तर की झीरम घाटी में नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया। इसमें कांग्रेस के शीर्ष पंक्ति के नेता शहीद हो गए। कांग्रेसियों के काफिले पर हमले के बाद नक्सलियों ने तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल को अगवा कर लिया. नक्सलियों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल को भी मार डाला। झीरम हमले के बाद नक्सली दोनों को जंगल ले गए थे। थोड़ी दूर ले जाकर दोनों के सिर में गोली मार दी। दिनेश के सिर पर टंगिया से भी प्रहार किया।उस समय गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया था कि हमले का असल टारगेट नंद कुमार पटेल ही थे। और इस तरह से नंदकुमार पटेल अपने राजनितिक करियर को बीच में ही छोड़कर आधे सफर से रुखसत हो गए।

उन दिनों उमेश बैंगलोर में एक सॉफ्टेवयर कंपनी में नौकरी करते थे। राहुल गाँधी ने ही इस दुःख से आहत उमेश को उसी साल के विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था। उमेश ने अपने पिता की विरासत को बरक़रार रखने के लिए चुनाव लड़ा। 2013 के विधानसभा चुनाव में उमेश भाजपा के जवाहर नायक को करीब 40 हजार वोट से हराकर पहली बार विधायक बने थे। फिर 2018 में भी इसी सीट से बीजेपी में शामिल उनके प्रतिद्वंदी ओपी चौधरी को हराकर दोबारा विधानसभा पहुंचे। और आज तक अपने पिता की विरासत को बरक़रार रखे हुए हैं।

तो इस तरह से अपने पिता की मौत के बाद आज भी उमेश पटेल ने अपनी विरासत संभालकर रखी है। वैसे क्या अगले विधानसभा चुनाव में भी नंदकुमार पटेल की यह विरासत वो संभल पाएंगे ?

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