छत्तीसगढ़ में हर साल राज्य अलंकरण समारोह आयोजित होता है। इस समारोह में ऐसे लोगों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने तमाम अभावों, संसाधनों की कमी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर अपने-अपने क्षेत्र में असाधारण काम किया हो।
इन सम्मानों का मूल उद्देश्य ही ऐसे गुमनाम और संघर्षशील लोगों को पहचान देना है, जो बिना किसी बड़े मंच, सत्ता के संरक्षण या आर्थिक संसाधनों के समाज और देश के हित में लगातार काम कर रहे हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी ऐसे लोगों को राज्य अलंकरण से सम्मानित किया जाता है। लेकिन आज मैं आपको तीन ऐसे नाम बताना चाहता हूं, जिन्हें सम्मानित करने के लिए सरकार को न तो किसी खोजबीन की जरूरत थी और न ही किसी सिफारिश की। क्योंकि इनका काम किसी परिचय का मोहताज नहीं है । इनकी पत्रकारिता को पूरा छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश का एक बड़ा हिस्सा देखता और जानता है । और इनमें तीसरा नाम तो ऐसा है जो पक्ष-विपक्ष और जनता के साथ साथ नक्सलियों के लिए भी बहुत ही जाना पहचाना है और इन्होने बस्तर टॉकीज नाम संचालित अपने यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से वो काम किया है जो बड़े बड़े मीडिया हाउस नहीं कर सके ।
पहला नाम है – संदीप शुक्ला।

संदीप शुक्ला कई वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने नशे के अवैध कारोबार और नकली खाद्य पदार्थों जैसे जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाई है। ऐसे विषयों पर काम करना मुश्किल होता है, लेकिन उन्होंने अपनी पत्रकारिता जारी रखी। इस दौरान उन पर फर्जी एफआईआर भी दर्ज हुईं। कई बड़े संस्थानों में काम करने के बाद अब ये अपने रॉ रिपोर्टर नाम से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार समाज हित में काम कर रहे हैं ।
दूसरा नाम है – यशवंत साहू।

छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस नाम से परिचित न हो। अपनी अलग पहचान, बेबाक अंदाज और लगातार सक्रिय पत्रकारिता के दम पर उन्होंने प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है । और भिलाई टाइम्स के लगातार जनहित के मुद्दों पर काम कर रहे हैं ।
और तीसरा बड़ा नाम है – रानू तिवारी ।

बस्तर में पुलिस और सुरक्षा बल जहां भारी बंदूक और गोला बारूद होने के बाद भी कभी नहीं पहुंच पाए थे, वहां सबसे पहले रानू तिवारी पहुंच जाते थे । रानू तिवारी अगर आधी रात को भी गृहमंत्री को फोन कर दें तो विजय शर्मा सबकुछ छोड़कर उनसे बात करते थे, इन्होने अपने दम पर कई नक्सलियों का सरेंडर कराया । वो भी अपनी जान जोखिम में डालकर । रानू तिवारी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बस्तर टॉकीज से वो कर दिखाया जो करोड़ों का सेटअप और पर्याप्त संसाधनों के बाद भी बड़े मीडिया हाउस नहीं कर सके ।
ये तीनों नाम ऐसे पत्रकारों के हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन सवाल यह है कि राज्य अलंकरण की सूची में इन्हें जगह क्यों नहीं मिली?
क्या सरकार सिर्फ इसलिये इन्हें पत्रकार नहीं मानती कि ये किसी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम नहीं करते, किसी ऐसे संस्थान में काम नहीं करते जिसका मालिक एक बिजनसमैन हो ।











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